डिजिटल कमांड और लोकल ऑपरेटिव,ऐसे चलता था राजस्थान में संगठित गैंग का पूरा नेटवर्क

19 जिलों में हुई पुलिस की समन्वित कार्रवाई के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ये संगठित गिरोह काम कैसे करते थे? शुरुआती जांच और पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी बताती है कि यह नेटवर्क पारंपरिक अपराध से कहीं ज्यादा आधुनिक और संरचित तरीके से संचालित हो रहा था।

बाहर बैठा ‘कमांड’, अंदर एक्टिव ‘फील्ड यूनिट’ जांच में सामने आया है कि कई गैंग लीडर प्रदेश से बाहर या विदेश में बैठकर नेटवर्क को ऑपरेट कर रहे थे। स्थानीय स्तर पर 3 से 5 लोगों की छोटी-छोटी टीमें बनाई गई थीं, जिन्हें “टास्क बेस्ड काम” दिया जाता था।

इनका स्ट्रक्चर कुछ इस तरह था: 1. रंगदारी और धमकी कॉल – लोकल व्यापारियों और ठेकेदारों को निशाना 2. हथियार सप्लाई – एक राज्य से खरीद, दूसरे में डिलीवरी 3. ड्रग्स ट्रांजिट – सीमावर्ती जिलों को कॉरिडोर की तरह इस्तेमाल 4. फाइनेंशियल मैनेजमेंट – फर्जी बैंक खातों और एटीएम कार्ड से लेनदेन चूरू में बैंक कार्ड, पासबुक और नकदी की बरामदगी इसी फाइनेंशियल स्ट्रक्चर की ओर इशारा करती है।

428 गैंग सदस्यों के डोजियर तैयार कर उनके कॉल रिकॉर्ड, बैंक ट्रेल और डिजिटल एक्टिविटी की मैपिंग की गई। यही वजह रही कि 19 जिलों में एक साथ दबिश देकर नेटवर्क को सरप्राइज किया गया ताकि सूचना लीक न हो और सदस्य भाग न सकें। जांच से जो तस्वीर सामने आ रही है, वह यह बताती है कि राजस्थान में संगठित अपराध अब पारंपरिक “स्थानीय बदमाश” मॉडल से आगे बढ़ चुका है। यह डिजिटल कमांड, फाइनेंशियल मैनेजमेंट और मल्टी-स्टेट सप्लाई चेन वाला स्ट्रक्चर बन चुका था। 19 जिलों में हुई कार्रवाई दरअसल इसी मॉड्यूल को तोड़ने की कोशिश है—जहां अपराध अब छिपकर नहीं, बल्कि संगठित सिस्टम की तरह संचालित हो रहा था।