राजस्थान में पंचायत चुनावों में हो रही देरी अब एक नए विवाद का रूप लेती दिखाई दे रही है। राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य सरकार के बीच इस मुद्दे पर तनातनी की स्थिति बन गई है। सुप्रीम कोर्ट की अवमानना को लेकर भेजे गए नोटिस के बाद आयोग ने स्पष्ट किया है कि चुनाव में देरी की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। इस संबंध में आयोग द्वारा राज्य सरकार को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत कराया गया है।
अवमानना नोटिस के बाद बदला घटनाक्रम
राज्य में पंचायत और निकाय चुनावों को वन स्टेट वन इलेक्शन पॉलिसी के तहत करवाने की बात भजनलाल सरकार की ओर से कही जा रही है। लेकिन चुनाव कार्यक्रम जारी न होने के कारण मामला अब न्यायिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है। याचिकाकर्ता संयम लोढ़ा की ओर से राज्य निर्वाचन आयोग को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का नोटिस भेजे जाने के बाद घटनाक्रम में नया मोड़ आया है। इसके बाद आयोग ने राज्य सरकार को पत्र लिखते हुए स्पष्ट किया कि यदि चुनाव में देरी के कारण न्यायालय की अवमानना की स्थिति बनती है तो इसके लिए संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होगी।
अदालतों ने दिए थे चुनाव कराने के निर्देश
राजस्थान हाईकोर्ट और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्य में पंचायत चुनाव 15 अप्रैल तक संपन्न कराने के निर्देश दिए थे। हालांकि अब तक चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं किया गया है। ऐसे में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर यह सवाल उठने लगा है कि यदि निर्धारित समय तक चुनाव नहीं होते हैं तो न्यायालय के आदेशों की अवमानना के लिए जिम्मेदार कौन होगा।
पंचायतों का कार्यकाल पूरा, चुनाव अब भी लंबित
राजस्थान में पंचायतों का पुनर्गठन पहले ही किया जा चुका है और प्रदेश की सभी पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है। चुनाव निर्धारित समय से काफी पहले होने चाहिए थे, लेकिन करीब एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद चुनाव नहीं कराए गए हैं। इससे स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को लेकर अटका मामला
राज्य सरकार ने अभी तक पंचायत चुनावों के लिए ओबीसी आयोग की रिपोर्ट राज्य निर्वाचन आयोग को नहीं सौंपी है। इसी कारण आरक्षण से संबंधित जानकारी आयोग को उपलब्ध नहीं हो पाई है। वहीं यह भी उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश में सुप्रीम कोर्ट ने बिना ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के भी चुनाव कराने के निर्देश दिए थे। ऐसे में राजस्थान में चुनावों में हो रही देरी को लेकर कानूनी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चर्चा तेज हो गई है।