आज जब मोबाइल नेटवर्क हमारे रोजमर्रा के जीवन की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है, तब भी देश-दुनिया में कई ऐसे इलाके हैं जहां फोन में नेटवर्क आना सपना जैसा लगता है. पहाड़, घने जंगल, रेगिस्तान, समंदर और आपदा प्रभावित क्षेत्र- यहां मोबाइल टावर लगाना मुश्किल और महंगा होता है. ऐसे में ISRO का BlueBird Block-2 सैटेलाइट आम लोगों के लिए एक नई उम्मीद लेकर आया है. यह सैटेलाइट मोबाइल टावर की तरह काम करेगा, लेकिन जमीन पर नहीं, बल्कि अंतरिक्ष से.
BlueBird Block-2 लॉन्च: क्या और कब
ISRO ने 24 दिसंबर की सुबह BlueBird Block-2 सैटेलाइट को अपने सबसे ताकतवर रॉकेट LVM3-M6 से लॉन्च किया. यह लॉन्च श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से सुबह 8:55 बजे किया गया. करीब 15 मिनट बाद सैटेलाइट रॉकेट से अलग होकर लो अर्थ ऑर्बिट यानी LEO में पहुंचा. इस मिशन को ISRO की NewSpace India Limited (NSIL) के जरिए अंजाम दिया गया.
अब तक का सबसे भारी LEO सैटेलाइट
BlueBird Block-2 का वजन करीब 6100 किलोग्राम है. यह अब तक का सबसे भारी सैटेलाइट है, जिसे ISRO ने LVM3 रॉकेट से लो अर्थ ऑर्बिट में भेजा है. इस लॉन्च के साथ LVM3 ने अपना तीसरा पूरी तरह कमर्शियल मिशन पूरा किया है. कुल मिलाकर यह LVM3 की नौवीं उड़ान, ISRO का 101वां लॉन्च और इस साल का पांचवां मिशन बन गया है.
BlueBird Block-2 आखिर करता क्या है
यह सैटेलाइट खासतौर पर आम स्मार्टफोन यूजर्स के लिए डिजाइन किया गया है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बिना किसी सैटेलाइट फोन, खास एंटीना या फोन में बदलाव के सीधे 4G और 5G सेवाएं दे सकता है. यानी वॉयस कॉल, वीडियो कॉल, मैसेजिंग, स्ट्रीमिंग और इंटरनेट- सब कुछ सीधे अंतरिक्ष से. यह उन इलाकों में भी नेटवर्क पहुंचा सकता है, जहां जमीन पर कोई मोबाइल टावर मौजूद नहीं है.
सबसे बड़ा एंटीना, सबसे बड़ी ताकत
BlueBird Block-2 में 223 वर्ग मीटर का फेज्ड-एरे एंटीना लगा है, जो लो अर्थ ऑर्बिट में लगाया गया अब तक का सबसे बड़ा कमर्शियल कम्युनिकेशन एंटीना माना जा रहा है. जब यह अंतरिक्ष में पूरी तरह खुलता है, तो यह 5600 से ज्यादा सिग्नल सेल बनाता है. यही वजह है कि यह आम मोबाइल फोन से निकलने वाले बेहद कमजोर सिग्नल को भी पकड़ सकता है. इससे हिमालय जैसे दुर्गम इलाकों, समुद्रों, रेगिस्तानों और आपदा क्षेत्रों में भी कनेक्टिविटी संभव हो जाती है.
यह सिस्टम पुराने सैटेलाइट से कैसे अलग है
अब तक सैटेलाइट से बात करने के लिए डिश या खास टर्मिनल की जरूरत पड़ती थी. लेकिन BlueBird Block-2 मोबाइल टावर की तरह काम करता है. जैसे ही आप टेरेस्ट्रियल नेटवर्क से बाहर जाते हैं, आपके फोन का सिग्नल सीधे ऊपर मौजूद सैटेलाइट तक पहुंचता है. वहां से सिग्नल जमीन पर बने गेटवे स्टेशन को भेजा जाता है और फिर आपके मोबाइल ऑपरेटर के नेटवर्क में शामिल हो जाता है. यह पूरी प्रक्रिया इतनी स्मूद होती है कि यूजर को फर्क महसूस नहीं होता.
कम गेटवे, ज्यादा कवरेज
इस सिस्टम की एक और बड़ी खासियत यह है कि हर देश में बहुत ज्यादा गेटवे स्टेशन लगाने की जरूरत नहीं पड़ती. कुछ गिने-चुने गेटवे ही पूरे देश या बड़े इलाके को कवर कर सकते हैं. जैसे-जैसे BlueBird कॉन्स्टेलेशन में और सैटेलाइट जुड़ेंगे, एक सैटेलाइट से दूसरे में ऑटोमैटिक हैंडओवर होता रहेगा, जिससे नेटवर्क लगातार बना रहेगा.
LVM3 क्यों बना इस मिशन की रीढ़
LVM3 ISRO का सबसे शक्तिशाली रॉकेट है. इसकी ऊंचाई 43.5 मीटर है और वजन करीब 640 टन. इसमें बड़ा 5 मीटर डायमीटर का पेलोड फेयरिंग है, जिसमें ऐसे विशाल एंटीना वाले सैटेलाइट आसानी से फिट हो जाते हैं. इसके तीन चरण—सॉलिड बूस्टर, लिक्विड कोर और क्रायोजेनिक अपर स्टेज—इसे भारी पेलोड को सटीक ऑर्बिट में पहुंचाने में सक्षम बनाते हैं. इसी रॉकेट ने चंद्रयान-2, चंद्रयान-3 और OneWeb जैसे अहम मिशन पूरे किए हैं.
भारत के लिए क्यों अहम है यह कमर्शियल मिशन
यह लॉन्च दिखाता है कि ISRO अब सिर्फ वैज्ञानिक मिशन ही नहीं, बल्कि ग्लोबल टेलिकॉम इंडस्ट्री के लिए भी एक भरोसेमंद लॉन्च पार्टनर बन रहा है. डायरेक्ट-टू-मोबाइल सैटेलाइट नेटवर्क भविष्य की सबसे बड़ी कनेक्टिविटी टेक्नोलॉजी मानी जा रही है. ऐसे में LVM3 की क्षमता भारत को इस बाजार में मजबूत स्थिति दिलाती है.
आगे क्या होगा BlueBird Block-2 के साथ
ऑर्बिट में पहुंचने के बाद सैटेलाइट का एंटीना खोला जाएगा और अलग-अलग सिस्टम की जांच होगी. इसके बाद इसे AST SpaceMobil