अमेरिका ने होर्मुज से चुपचाप भेज दिया कच्चा तेल, ट्रंप की इस स्‍ट्रैटेजी का मतलब समझ‍िए

नई दिल्‍ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो बड़े सोशल मीडिया पोस्ट किए हैं। इन्‍होंने फारस की खाड़ी में वॉशिंगटन की लंबी अवधि की रणनीति पर बहस फिर से शुरू कर दी है। ये दोनों ही पोस्‍ट कच्‍चे तेल की सप्‍लाई से जुड़े हैं। साथ ही भविष्‍य में अमेरिका की ओर से अपनाई जाने वाली स्‍ट्रैटेजी की ओर इशारा करते हैं।

एक मैसेज में ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने होर्मुज स्‍ट्रेट से तेल टैंकरों और कमर्शियल जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए अमेरिकी सेना को एक ‘सीक्रेट मिशन’ का आदेश दिया था। उन्होंने कहा कि इस कोशिश से 10 करोड़ बैरल से ज्‍यादा तेल और 200 से ज्‍यादा कमर्शियल जहाज इस अहम समुद्री रास्ते से सुरक्षित गुजर पाए।

दूसरे मैसेज में ट्रंप ने कहा कि ईरान की सैन्य ताकत को कमजोर करने के बाद अमेरिका आखिरकार खर्ग द्वीप पर कब्जा कर सकता है। यह ईरान का मुख्य ऑयल एक्‍सपोर्ट टर्मिनल है। इसके जरिये अमेरिका देश के तेल और गैस बाजारों पर पूरी तरह नियंत्रण कर सकता है।

ट्रंंप के पुराने रुख का कन्फर्मेशन
होर्मुज में सीक्रेट ऑपरेशन के जिक्र के साथ शेयर की गई इन बातों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रशासन किसी ऐसी बड़ी नीति का संकेत दे रहा है जो ईरान के परमाणु कार्यक्रम से आगे बढ़कर ऊर्जा के प्रवाह और समुद्री सुरक्षा पर नियंत्रण पर केंद्रित है।

एक्‍स पर इन पोस्ट का विश्लेषण करने वाले एक पॉलिसी रणनीतिकार के अनुसार, ट्रंप की ये बातें तेहरान के साथ हालिया तनाव पर कोई अचानक प्रतिक्रिया नहीं हैं। इसके बजाय, ये उस विचार को दर्शाती हैं जिसे उन्होंने लगभग चार दशकों से लगातार कहा है- अगर अमेरिका वैश्विक व्यापार मार्गों की सुरक्षा में खून और पैसा खर्च करता है तो उसे सीधा आर्थिक फायदा मिलना चाहिए।

इनकी हेडलाइन थी- ‘अमेरिका की विदेशी रक्षा नीति में ऐसी कोई खराबी नहीं है जिसे थोड़ी हिम्मत से ठीक न किया जा सके।’

उन विज्ञापनों में ट्रंप ने सवाल उठाया था कि अमेरिका फारस की खाड़ी के तेल मार्गों को सुरक्षित करने के लिए पैसे क्यों खर्च कर रहा है, जिनसे मुख्य रूप से जापान और सऊदी अरब जैसे सहयोगियों को फायदा होता है।

उनका तर्क साफ था- अमेरिका को शिपिंग लेन की सुरक्षा का खर्च तब तक नहीं उठाना चाहिए जब तक कि सहयोगी देश ज्‍यादा योगदान न दें या बदले में अमेरिका को कुछ ठोस फायदा न मिले।

अपने विचारों को ट्रंप ने किया था साफ
उसी साल पत्रकार बारबरा वॉल्टर्स के साथ एक चर्चित टीवी इंटरव्यू में ट्रंप ने ईरान-इराक ‘टैंकर युद्ध’ के बारे में बातचीत के दौरान इस विचार को और विस्तार से समझाया था, जब खाड़ी में तेल टैंकरों पर हमलों से ग्‍लोबल एनर्जी सप्‍लाई को खतरा पैदा हो गया था। जब वॉल्टर्स ने उनके आक्रामक बयानों पर सवाल उठाया और पूछा कि क्या इसका मतलब किसी और मध्य-पूर्वी संघर्ष में सेना भेजना है तो ट्रंप ने जवाब दिया कि अगर ईरान अमेरिकी हितों पर हमला करता है तो वॉशिंगटन को उनके किसी बड़े तेल ठिकाने पर कब्जा कर लेना चाहिए। उसे अपने पास रखना चाहिए।

उन्होंने यह भी सवाल किया कि अमेरिका बिना किसी मुआवजे के शिपिंग की सुरक्षा पर अरबों डॉलर क्यों खर्च कर रहा है और पूछा, ‘हम जाकर ईरान के कुछ तेल पर कब्जा क्यों नहीं कर सकते?’

उस समय इन बयानों को मुख्य रूप से न्यूयॉर्क के एक रियल एस्टेट डेवलपर की उकसावे वाली बातें माना गया था। लेकिन, विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप के पूरे राजनीतिक करियर में यही बातें बार-बार सामने आई हैं। चाहे वह सहयोगियों से अमेरिकी सुरक्षा गारंटी के लिए ‘अपना उचित हिस्सा चुकाने’ की मांग हो, रणनीतिक संसाधनों पर नियंत्रण पर जोर देना हो या विदेश नीति के प्रति उनका लेन-देन वाला नजरिया हो।

होर्मुज में सीक्रेट ऑपरेशन का जिक्र क्यों?
होर्मुज स्‍ट्रेट दुनिया के सबसे अहम एनर्जी चोकपॉइंट्स में से एक है। फारस की खाड़ी को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने वाले इस संकरे रास्ते से दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले तेल का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। वहां किसी भी तरह की रुकावट से एनर्जी की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। दुनिया भर के वित्तीय बाजार हिल सकते हैं।

टैंकरों को सुरक्षा देने और तेल की ढुलाई में मदद करने की गुप्त कोशिश का जिक्र करके ट्रंप अमेरिकी सेना को सिर्फ सुरक्षा देने वाली ताकत के तौर पर नहीं, बल्कि ग्‍लोबल एनर्जी स्‍टेबिलिटी की गारंटी देने वाली ताकत के तौर पर पेश कर रहे हैं। इसका छिपा हुआ संदेश यह है कि आखिरकार होर्मुज स्‍ट्रेट तक पहुंच पर ईरान का नहीं, बल्कि अमेरिकी नौसेना की ताकत का कंट्रोल है।

उनका यह दावा कि होर्मुज स्‍ट्रेट पर ईरान का नहीं, बल्कि अमेरिका का नियंत्रण है, उस नैरेटिव से पूरी तरह मेल खाता है। इसके अनुसार समुद्री प्रभुत्व एक रणनीतिक संपत्ति और मोल-भाव करने का जरिया, दोनों है। यह उनकी उस पुरानी शिकायत को भी मजबूत करता है कि वॉशिंगटन के सहयोगियों ने अमेरिकी सैन्य सुरक्षा का जरूरत से ज्‍यादा फायदा उठाया है।

खर्ग द्वीप क्यों अहमियत रखता है?
ट्रंप का खर्ग द्वीप का जिक्र खास तौर पर ध्यान खींचने वाला है। फारस की खाड़ी के उत्तरी हिस्से में स्थित यह द्वीप ईरान के कच्चे तेल के निर्यात का ज्‍यादातर हिस्सा संभालता है। देश के सबसे अहम रणनीतिक ऊर्जा बुनियादी ढांचों में से एक है। खर्ग द्वीप के लिए किसी भी खतरे के बहुत बड़े भू-राजनीतिक और आर्थिक नतीजे हो सकते हैं। इससे ईरान की निर्यात से होने वाली कमाई पर असर पड़ सकता है। ग्‍लोबल ऑयल मार्केट प्रभावित हो सकते हैं।

कई दशकों से मिलिट्री प्लानर्स ईरान के तेल इंफ्रास्ट्रक्चर को किसी भी टकराव में एक अहम हथियार या ‘लीवरेज’ के तौर पर देखते रहे हैं। ट्रंप का यह सुझाव कि अमेरिका एक दिन ईरान के तेल और गैस मार्केट पर ‘पूरी तरह से कब्जा’ कर सकता है, उनकी दशकों पुरानी सोच को दिखाता है कि मिलिट्री दखल की लागत को पूरा करने के लिए आर्थिक संसाधनों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

‘अमेरिका फर्स्ट’ की सोच
विदेश नीति के जानकारों का लंबे समय से मानना रहा है कि ट्रंप की सोच विचारधारा पर आधारित होने के बजाय लेन-देन (ट्रांजैक्शनल) पर आधारित है। ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के स्कॉलर थॉमस राइट की रिसर्च 1980 के दशक के आखिर से ट्रंप की सोच में एक जैसा पैटर्न दिखाती है- सहयोगियों को अमेरिकी सुरक्षा के लिए भुगतान करना चाहिए। मिलिट्री ताकत से मापने लायक फायदा मिलना चाहिए। रणनीतिक संसाधनों का इस्तेमाल दुश्मनों के खिलाफ दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है। इसका जिक्र एक्‍स पोस्ट में किया गया है।

इस नजरिए से देखें तो ‘ट्रुथ सोशल’ पर हालिया पोस्ट किसी नई पॉलिसी को सामने लाने के बजाय पुरानी नीति को फिर से जिंदा करने के बारे में हैं। इस नजरिए से ‘अमेरिका फर्स्ट’ का मतलब सिर्फ विदेशी जिम्मेदारियों को कम करना नहीं है, बल्कि यह पक्का करना भी है कि अमेरिकी सेना की किसी भी तैनाती से ठोस आर्थिक या रणनीतिक फायदा हो।