अमेरिका से समझौते में ईरान सरकार की ‘जीत के जश्न’ को खराब करेंगे कट्टरपंथी!

तेहरान: अमेरिका के साथ अंतरिम समझौते (एमओयू) को ईरान अपनी जीत बता रहा है। दुनिया के कई एक्सपर्ट भी कह रहे हैं कि समझौते के 14 प्वाइंट में ईरान की बातें ज्यादा मानी गई हैं। हालांकि ईरान का एक वर्ग ऐसा नहीं मानता है और वह समझौते के खिलाफ है। खासतौर से कट्टरपंथियों का धड़ा इसे ईरान की हार मान रहा है और सड़कों पर इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी किए गए हैं। एक्सपर्ट का कहना है कि ये ईरान सरकार की चुनौती बन सकते हैं।

सीएनएन के मुताबिक, ईरानी संसद के नेशनल सिक्योरिटी कमीशन के वाइस चेयरमैन महमूद नबावियन का कहना है कि इस समझौते से देश ‘अमेरिका की कॉलोनी’ बन जाएगा और होर्मुज जलडमरूमध्य इजरायल के लिए भी खुल जाएगा। ईरान के विदेश मंत्रालय के बाहर भी समझौते के खिलाफ रैली हुई है।

ईरान सरकार की चुनौती
ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स में मिडिल ईस्ट जियोइकोनॉमिक्स की हेड दीना एसफंडियारी का कहना है कि इस युद्ध ने ईरानी सरकार को एक तरह से नई जिंदगी दी है। इससे नाराजगी और प्रदर्शनों से कमजोर हुई सरकार को सत्ता पर अपनी पकड़ फिर से मजबूत करने का मौका मिला है। इसते बावजूद सरकार के सामने कई चुनौतियां हैं।

युद्ध के बाद सरकार की चुनौती नए उभरते गुटों को संभालना है। ईरान की ग्रैंड स्ट्रैटेजी के लेखक वली नस्र का मानना है कि मोजतबा खामेनेईऔर उनके करीबी लोगों को सबसे पहले ‘जेभे-ये पायदारी’ नाम के कट्टरपंथी गुट पर ध्यान देना होगा, जिससे नबावियन जुड़े हुए हैं। ये गुट जीत का दावा कर रही ईरान सरकार के ‘जश्न’ में भंग डाल सकते हैं।

कट्टरपंथियों का जमीनी प्रभाव
पैदारी गुट समझौते को मंजूरी दिलाने में अहम है। इसकी वजह जमीनी स्तर पर उसका प्रभाव है। इस समूह ने आम लोगों को लामबंद करने की क्षमता दिखाई है। युद्ध के दौरान समर्थकों को सड़कों पर उतरने के लिए संगठित किया है। वली नस्र के अनुसार, पैदारी गुट का गरीब और रूढ़िवादी ईरानियों के बीच समर्थन है, जिन्होंने युद्ध की मार ज्यादा झेली है। ये वर्ग ही देश के भीतर शांति को स्वीकार कराने में अहम भूमिका निभाएंगे।

एक्सपर्ट मानते हैं कि समझौते की सफलता काफी हद तक ईरानियों को मिलने वाली आर्थिक राहत पर निर्भर करेगी। ईरान को तुरंत आर्थिक और प्रतिबंधों से जुड़ी राहत की जरूरत है। ईरान की आर्थिक स्थिति खराब है। आर्थिक और सरकार-विरोधी विरोध-प्रदर्शनों की वजह बनी चिंताओं को दूर करने के लिए सरकार को इस समझौते के ठोस फायदे दिखाने होंगे।

तेहरान का संकट टला नहीं
लंदन के चैथम हाउस थिंक टैंक में मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका प्रोग्राम की डायरेक्टर सनम वकील ने कहा कि अमेरिका-ईरान समझौते से तेहरान के लिए बाहरी सैन्य खतरे कम होते हैं। हालांकि इससे ईरान की घरेलू आर्थिक, राजनीतिक या सामाजिक शिकायतें दूर नहीं होतीं और ना ही इससे स्थायी शांति की गारंटी मिलती है।

सनम कहती हैं कि इस समझौते को जनता का समर्थन इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या इससे उनकी रोजमर्रा की जिदगी बेहतर होती है। नस्र का भी मानना है कि समझौते को समर्थन इस बात पर निर्भर करेगा कि इससे देश के अंदर क्या सांस्कृतिक आजादी और आर्थिक फायदे मिल सकते हैं। इस बात को तेहरान की सत्ता में बैठे लोग भी जानते हैं।

ईरान के एक आम नागरिक रजा सीएनएन से कहते हैं कि समझौता सुनने में तो अच्छा लगता है लेकिन इसका जमीन पर असर जरूरी है। ऐसा ना होन पर चीजें खराब हो सकती हैं। ऐसे में जरूरी है कि शांति लौटे और लोग बेहतर जिंदगी जियें।