प्रधानों को प्रशासक नहीं बनाए जाने के हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार अपील करेगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने 25 जून के अपने आदेश में कहा है कि असांविधानिक हो चुके नियमों के तहत ग्राम प्रधान प्रशासक की भूमिका नहीं निभा सकते हैं। सरकार को 13 जुलाई तक चुनाव की रूपरेखा पेश करने का भी आदेश दिया है।
कोर्ट ने आदेश में कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 243 (ई) और 243 (के) के तहत पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। वहीं, शासन के उच्चपदस्थ सूत्रों का कहना है कि उप्र पंचायतीराज अधिनियम 1947 की धारा 12 की उपधारा (3-ए) मुख्य रूप से ग्राम पंचायत के कार्यकाल और चुनाव टलने की असाधारण परिस्थितियों से संबंधित है।
इस धारा के अनुसार, यदि अपरिहार्य परिस्थितियों या लोकहित में ग्राम पंचायत का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव करा पाना संभव न हो तो राज्य सरकार या उसके द्वारा अधिकृत अधिकारी को यह शक्ति होगी कि वह उस अवधि के लिए ग्राम पंचायतों के कार्यों के संचालन के लिए वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था (जैसे प्रशासक या प्रशासनिक समिति की नियुक्ति) कर सके। इस उपधारा के रूप में यह ऐतिहासिक संशोधन प्रदेश में अप्रैल 1994 में लागू हुआ।
हाईकोर्ट ने बाद में प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के केस में व्यवस्था दी है कि इस धारा 12 (3-ए) का उपयोग करके चुनावों को अनिश्चितकाल के लिए टालना या ग्राम प्रधानों या प्रशासकों का कार्यकाल मनमाने ढंग से बढ़ाना असांविधानिक है।
चुनाव कराना राज्य निर्वाचन आयोग का सांविधानिक अधिकार है जिसमें राज्य सरकार प्रशासनिक बहाने बनाकर देरी नहीं कर सकती। जानकारों का कहना है कि उप्र पंचायतीराज अधिनियम, 1947 की धारा 12 में जोड़ी गई उपधारा (3-ए) को अब तक हटाया नहीं गया है इसलिए इस कानून का अभी आधार बना हुआ है।
इसी को आधार बनाते हुए राज्य सरकार एकल पीठ के खिलाफ अगले सप्ताह डबल बेंच या फुल बेंच में सुनवाई के लिए अपील दायर करेगी। अपील दायर करने के निर्णय की पुष्टि उप्र राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष और इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस राम औतार सिंह ने भी की है।
आयोग को पक्षकार बनाने के आदेश को भी दी जाएगी चुनौती
कोर्ट ने मामले में याची को समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग को भी पक्षकार बनाने की अनुमति दी है। जस्टिस राम औतार सिंह का कहना है कि कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट की धारा-9 के तहत आयोग को किसी मुकदमे में पार्टी नहीं बनाया जा सकता है।
नवंबर तक रिपोर्ट दे पाएगा समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग
राज्य सरकार ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए 18 मई को उप्र राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गई अनिवार्य व्यवस्था के तहत आयोग बनाया गया है। इसका मुख्य कार्य राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति और पिछड़ेपन का अध्ययन करना है।
आयोग के अध्यक्ष के अनुसार सभी 75 जिलों के डीएम से पिछड़े वर्ग की आबादी के आंकड़े ले लिए गए हैं। आयोग ने अब तक तीन जिलों मेरठ, हापुड़ और बागपत का दौरा भी कर लिया है। ब्लॉक और गांव स्तर पर जाकर डीएम से मिले आंकड़ों का सत्यापन किया जा रहा है। आयोग अंतिम रिपोर्ट देने से पहले सभी 75 जिलों में भ्रमण करेगा। इसमें 6 माह लगेंगे। हम अपनी रिपोर्ट नवंबर तक दे पाएंगे।