मृत्यु के बाद आत्मा कितने दिनों में पहुंचती है यमलोक? गरुड़ पुराण में दर्ज है रहस्य!

Soul journey after death: सनातन धर्म में गरुड़ पुराण की अपनी एक अलग ही अहमियत है. इस पवित्र ग्रंथ में इंसान के जन्म, उसकी मौत और उसके बाद शुरू होने वाली अनदेखी दुनिया के बारे में बहुत खुलकर बात की गई है. हर इंसान के दिल में कभी न कभी ये ख्याल जरूर आता है कि जब शरीर से सांसें छूट जाती हैं, तो उसके बाद आत्मा आखिर कहां जाती है.

गरुड़ पुराण कहता है कि मौत के ठीक बाद आत्मा सीधे यमराज के दरबार में नहीं पहुंचती. वहां तक पहुंचने के लिए उसे एक बहुत ही लंबा, कठिन और अनजान सफर तय करना पड़ता है. इस पूरे रास्ते को नापने में आत्मा को करीब 47 दिन लग जाते हैं.

यमलोक में होता है हिसाब-किताब
पुरानी मान्यताओं की मानें तो जैसे ही किसी इंसान के प्राण निकलते हैं, यमराज के दो दूत उसे लेने आ पहुंचते हैं. वे आत्मा को अपने साथ सिर्फ 24 घंटे के लिए यमलोक लेकर जाते हैं. वहां आत्मा को एक झलक दिखाई जाती है कि उसने अपनी पूरी जिंदगी में क्या क्या अच्छे और बुरे काम किए हैं. ये हिसाब किताब दिखाने के बाद यमदूत उस आत्मा को वापस उसी घर में लाकर छोड़ देते हैं, जहां उसकी मौत हुई थी.

मौत के बाद के ये 13 दिन आत्मा के लिए बहुत खास होते हैं, क्योंकि वह अपने ही परिवार के लोगों के बीच भटकती रहती है. यही वजह है कि हिंदू धर्म में 13 दिनों तक पिंड दान और श्राद्ध की रस्म निभाई जाती है, ताकि उस भोजन और पानी की ताकत से आत्मा को आगे के सफर के लिए ऊर्जा मिल सके.

86 हजार योजन लंबा रास्ता
जैसे ही घर में तेरहवीं की रस्म पूरी होती है, वैसे ही आत्मा का असली और बेहद डरावना सफर शुरू हो जाता है. गरुड़ पुराण बताता है कि यमलोक जाने का यह रास्ता कोई सीधा साधा रास्ता नहीं है. ये सफर करीब 86 हजार योजन लंबा है, जो बेहद सुनसान और खौफनाक जंगलों से होकर गुजरता है.

इस रास्ते पर आत्मा को आराम करने के लिए न तो कोई छांव मिलती है और न ही गले को तर करने के लिए पानी की एक भी बूंद. यमदूत आत्मा को रस्सी से बांध देते हैं और घसीटते हुए आगे ले जाते हैं. इस दौरान आत्मा भूख और प्यास से बुरी तरह तड़पती है. इस मुश्किल घड़ी में धरती पर उसके परिवार द्वारा किया गया पिंड दान ही उसकी एकमात्र ताकत बनता है.

सफर के बीच में भयानक नदी
इस भयानक सफर के बीच में एक ऐसी नदी आती है जिसे सुनकर ही रूह कांप जाए, इसका नाम है वैतरणी नदी. ये कोई साधारण पानी की नदी नहीं है, बल्कि इसमें गाढ़ा खून, पीप, मवाद, हड्डियां और सड़ा हुआ मांस बहता है. इस खौफनाक नदी में आदमखोर मगरमच्छ और डरावने जीव तैरते रहते हैं.

जिन लोगों ने जीते जी सिर्फ पाप और दूसरों का दिल दुखाने का काम किया होता है, उनकी आत्मा इस नदी को देखकर ही थर थर कांपने लगती है. पापी आत्माओं को इस खौलती हुई नदी के बीच से तैरकर जाना पड़ता है, जहां उन्हें असहनीय दर्द मिलता है. इसके उलट, जिन लोगों ने अपनी जिंदगी में गाय का दान किया होता है या अच्छे काम किए होते हैं, उनकी आत्मा एक सुंदर नाव पर बैठकर इस डरावनी नदी को बड़े आराम से पार कर लेती है.

47 दिनों की लंबी यात्रा
भूख, प्यास और तमाम दुखों को झेलते हुए, पूरे 47 दिनों की इस लंबी यात्रा के बाद आत्मा आखिरकार यमराज के मुख्य दरबार में कदम रखती है. वहां न्याय के देवता यमराज अपने मुख्य सहायक चित्रगुप्त के साथ विराजमान होते हैं. चित्रगुप्त के पास अग्रसन्धानी नाम का एक बड़ा खाता होता है, जिसमें दुनिया के हर एक इंसान के पाई पाई का हिसाब लिखा रहता है.

चित्रगुप्त यमराज के सामने उस आत्मा के कर्मों का पूरा कच्चा चिट्ठा खोलकर रख देते हैं. इसके बाद यमराज अपना अंतिम फैसला सुनाते हैं कि आत्मा को उसके बुरे कर्मों की सजा काटने के लिए नर्क की आग में झोंका जाए या फिर उसके अच्छे कामों के बदले उसे स्वर्ग के सुख भोगने के लिए भेजा जाए.