जयपुरः इंटरनेट के मायाजाल के जरिए लोगों के बीच दूरियां कम हुई हैं और जो काम कई घंटों या दिनों में होते थे, वो काम आज पालक झपकते ही हो रहे हैं. जितनी लोगों की निर्भरता इंटरनेट और तकनीक पर बढ़ी हैं. उतनी ही परेशानी भी बढ़ रही है. साइबर अपराधी इसका फायदा उठा रहे हैं और लोगों की मेहनत की कमाई पर हाथ साफ कर रहे हैं.
देश और दुनिया के बाकि हिस्सों की तरह ही राजस्थान में साइबर ठगी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. अमूमन राजस्थान में हर दिन साइबर धोखाधड़ी की छह हजार से ज्यादा शिकायतें पुलिस के पास पहुंच रही हैं. इनमें करीब दो करोड़ रुपए की ठगी रोज हो रही है. लगातार बढ़ते साइबर अपराध के आंकड़ों को काबू करने के लिए प्रदेश की पुलिस ने भी कमर कस ली है.
समय पर शिकायत तो रिकवरी के चांस ज्यादाः राजस्थान पुलिस की साइबर क्राइम शाखा के डीआईजी शांतनु कुमार सिंह का कहना है कि अगर आपके साथ साइबर ठगी हो जाए तो समय रहते एक कॉल आपकी मेहनत की कमाई बचा सकता है.
राजस्थान पुलिस का दावा है की साइबर फ्रॉड का शिकार होने पर हेल्पलाइन 1930 सबसे बड़ा हथियार है. गोल्डन ऑवर्स में शिकायत दर्ज हो जाए तो आपकी रकम आपके खाते में वापस आ सकती है. साइबर ठगी की बढ़ती वारदातों को देखते हुए पुलिस अब कॉल लाइनो की संख्या में भी बढ़ोतरी कर रही है. पुलिस का कहना है कि समय पर साइबर ठगी की सूचना हो तो रिकवरी शत प्रतिशत होगी.
शिकायत के बाद होल्ड करवाते हैं रकमः उन्होंने आगे कहा, आपके या आपके परिचित के साथ किसी भी तरह की साइबर ठगी की वारदात हो तो घबराने की जरूरत नहीं. ऐसे समय पर तुरंत एक्शन लेना जरूरी है. साइबर फ्रॉड होने पर बिना देरी किए 1930 हेल्पलाइन पर कॉल करनी चाहिए. शिकायत दर्ज होते ही API आधारित सिस्टम के जरिए संबंधित बैंकों को अलर्ट भेजा जाता है और जिस खाते में रकम पहुंची है, वहां ट्रांजैक्शन को होल्ड करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. अगर पैसा दूसरे खाते में ट्रांसफर हो चुका हो तो वहां भी तत्काल सूचना भेजी जाती है.
ठगी के बाद 20 मिनट से एक घंटा गोल्डन ऑवर्सः डीआईजी सिंह ने बताया की साइबर ठगी के मामले में भी ‘गोल्डन ऑवर्स’ होते हैं. घटना के 20 मिनट से एक घंटे के भीतर शिकायत दर्ज होने पर रकम बचने की संभावना सबसे ज्यादा रहती है. इसके बाद पुलिस संबंधित बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और इस्तेमाल किए गए डिजिटल प्लेटफॉर्म की जांच कर साइबर अपराधियों तक पहुंचती है. पहले हेल्पलाइन 1930 की 32 कॉल लाइन थी. अब इनकी संख्या बढ़ाकर 60 की जा रही है. इसका मकसद यह है कि कोई भी शिकायत या कॉल छूट नहीं जाए. फिलहाल, पुलिस मुख्यालय, जयपुर कमिश्नरेट और चार रेंज मुख्यालयों पर कॉल टेकर्स और डिस्पैचर तैनात हैं.
ठगी की 26 फीसदी रकम रिफंड करवाईः उन्होंने बताया, जांच के बाद रकम होल्ड करवाई जाती है. अब तक करीब 26 प्रतिशत राशि पीड़ितों को वापस दिलाने में सफलता मिली है. इसके लिए मनी रिस्टोरेशन मॉड्यूल के जरिए बैंकिंग प्रक्रिया पूरी कर रकम वापस कराई जाती है. राजस्थान में फिलहाल 46 साइबर पुलिस स्टेशन संचालित हैं, जिन्हें जल्द बढ़ाकर 49 किया जाएगा. वहीं, 5 लाख रुपए से अधिक के डिजिटल अरेस्ट और इन्वेस्टमेंट स्कैम जैसे मामलों में स्वतः एफआईआर दर्ज की जाती है. साइबर अपराधियों के खिलाफ ऑपरेशन म्यूलहंटर, साइबर कवच, एंटी वायरस और वज्र प्रहार जैसे विशेष अभियान भी लगातार चलाए जा रहे हैं.