लखनऊ/पटना: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जेडीयू के बाद एलजेपी (आर) ने भी उतरने का मन बनाया है. लोकजनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा कि वह यूपी चुनाव 2027 में अपनी पार्टी की तरफ से प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि यूपी में पार्टी कैसे अच्छा प्रदर्शन करे, संगठन को कैसे रिचार्ज किया जाए इन तमाम जिम्मेदारियों को सांसद अरुण भारती देख रहे हैं.
पिछले दिनों पटना एयरपोर्ट पर पत्रकारों से बातचीत में चिराग पासवान ने कहा- ‘हमारे सांसद, विधायक और नेता यूपी में संगठन को बढ़ाने पर काम कर रहे हैं. चुनाव की स्ट्रैटेजी के बारे में सही समय पर फैसला लिया जाएगा.’
जमुई के सांसद अरुण भारती ने कहा कि LJP(RV) कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगी, यह चुनाव के समय तय किया जाएगा. उन्होंने कहा, ‘लेकिन हमारी तैयारी सभी 403 सीटों के लिए चल रही है. बिहार का ‘हरा गमछा’ (आरजेडी) यूपी में लाल टोपी (सपा) है, जहां दलित आबादी अच्छी तरह समझती है कि कैसे उन्हें साइकिल (चुनाव निशान) पर सूरज का सपना बेचा गया है. वह अब चिराग पासवान के साथ आ रहे हैं. हम उत्तर प्रदेश में दलित लोगों को एकजुट कर रहे हैं.’
यूपी के वोटों के गणित में कितने ताकतवर हैं पासवान?
चिराग पासवान मुख्य रूप से पासवान जाति के लोगों की पार्टी मानी जाती है. बिहार में भी वह वोटों के लिहाज से 5 से 6 फीसदी हिस्सेदारी का दावा करने वाली पासवान जाति आधारित राजनीति ही करते हैं. जहां तक उत्तर प्रदेश की बात है तो यहां पासवान जाति के वोटों की ताकत बहुत ही कम है. जो है भी वह पूरी तरह से अलग अलग जिलों में बिखरा है. राजनीतिक दलों की तरफ से ही दावा किया जाता है कि उत्तर प्रदेश में पासवान (दुसाध) समुदाय की जनसंख्या महज करीब 2.3 लाख है. जातीय ताकत के हिसाब से देखें तो यह यूपी की कुल आबादी का केवल 0.1% से भी कम है.
पासवान जाति के लोग उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल के जिलों जैसे वाराणसी, चंदौली, गाजीपुर, बलिया, मिर्जापुर, सोनभद्र, गोरखपुर और मऊ आदि में बसे हुए हैं. यहां भी उन्हें बिहार की ही तरह अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त है.
यूपी में अपनी पार्टी को क्यों लाना चाहते हैं चिराग?
2014 के बाद से उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलितों की सबसे बड़ी नेता मायावती कमजोर हुई हैं. उनकी पार्टी बहुजन समाज पार्टी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. ऐसे में ना केवल उत्तर प्रदेश बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी एक मजबूत और सर्वमान्य दलित नेता का स्पेस खाली दिखता है. ऐसे में चिराग पासवान उस जगह के लिए खुद को विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश में हैं.
यही वजह है कि चिराग की पार्टी झारखंड, पंजाब, नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में भी प्रत्याशी उतारती रही है. यहां याद करा दें कि 1995-2000 के सालों में चिराग पासवान के पिता रामिवलास पासवान राष्ट्रीय स्तर पर दलित नेता के रूप में बड़ा चेहरा बन गए थे. लोकसभा में रामविलास पासवान ना केवल बिहार बल्कि देशभर के दलितों की बात रखा करते थे. माना जा रहा है कि चिराग पासवान भी मानते हैं कि वह केंद्रीय मंत्री तो बन ही चुके हैं, ऐसे में वह खुद को पासवान समाज के बीच स्वीकार्यता से आगे बढ़कर संपूर्ण दलित समाज के नेता के रूप में स्वीकारे जाएं.