पटना: बिहार भौगोलिक रूप से मौसम परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। मानसून दगा दे रहा है। धान की रोपनी पिछड़ रही है। किसान परेशान हैं। दूसरी तरफ बिहार, राजनीतिक रूप से भी मौसम परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। लालू यादव खुद को सामाजिक न्याय का पुरोधा मानते हैं। जनता उन्हें गरीबों का मसीहा मानती रही है। लेकिन, वक्त के साथ अब लालू यादव भी राजनीतिक परिवर्तन के शिकार हैं। जिस पार्टी को उन्होंने खून-पसीने से सींच कर खड़ा और बड़ा किया, उसके स्थापना दिवस (5 जुलाई) के दिन न तो कोई कार्यक्रम किया और न कोई सीधा जनसंवाद किया। घर में बैठे-बिठाये जनता के नाम संदेश जारी कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। खुद को ‘जननेता’ कहने वाले तेजस्वी यादव को विदेश जाने की इतनी जल्दी थी कि उन्होंने पार्टी स्थापना दिवस समारोह 5 जुलाई के बदले 1 जुलाई को ही मना लिया। ये तो सुविधा की राजनीति की पराकाष्ठा है। क्या कोई व्यक्ति अपना जन्मदिन पांच दिन पहले या पांच दिन मना सकता है?
जीत का गुरु ज्ञान बांटने वाले पीके अब क्यों मांग रहे दूसरे से मदद?
राजनीतिक मौसम परिवर्तन के दूसरे बड़े शिकार प्रशांत किशोर (पीके) हैं। चुनावी जीत का ‘गुरु ज्ञान’ बांटने वाले प्रशांत किशोर खुद अपनी जीत के लिए यहां-वहां झोली फैला कर मदद की गुहार लगा रहे हैं। उनका दावा है कि उन्होंने चुनाव में जीत दिलाकर कई मुख्यमंत्री बनाये। तो अब सिर्फ एक सीट पर जीत के लिए याचना क्यों कर रहे हैं? याचना भी किससे कर रहे हैं? उस तेजस्वी यादव से जिन्हें पिछले एक साल से नौवीं फेल बता कर अक्षम नेता करार देते रहे हैं।
प्रशांत किशोर न्यूयॉर्क स्थिति संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय में पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट के रूप में काम कर चुके हैं। फिर न्यूयॉर्क से डेस्क जॉब छोड़ कर फील्ड वर्क के लिए अफ्रीकी देश चाड गये। शोध और आंकड़ों के महाज्ञानी हैं। नेता बनने के बाद उन्होंने 2024 में जनसुराज का अमेरिका चैप्टर लॉन्च किया। अमेरिका में पार्टी का संगठन खड़ा करने के बाद फिर अमेरिका गए थे।
‘नौंवी फेल’ की शरण में ‘महाज्ञानी’!
अब बदलते मौसम का कमाल देखिए कि अमेरिका रिटर्न महाज्ञानी (प्रशांत किशोर) खुद की चुनावी जीत के लिए नौवीं फेल (तेजस्वी यादव) की शरण में गिर पड़ा है। पटना के बांकीपुर विधानसभा सीट पर 30 जुलाई को उपचुनाव होना है। प्रशांत किशोर यहां से उम्मीदवार बनने वाले हैं। उन्होंने अपनी जीत के लिए तेजस्वी के नेतृत्व वाले महागठबंधन से समर्थन मांगा है। इसका मतलब है कि अब प्रशांत किशोर मानते हैं कि तेजस्वी यादव के पास जनसमर्थन है, जिसकी मदद से वे चुनावी वैतरणी पार कर सकते हैं। ये तो प्रशांत किशोर अब पलट गये हैं?
तेजस्वी बिना कागज समाजवाद पर पांच मिनट बोल कर दिखाएं: पीके
यही प्रशांत किशोर 2025 में कहते थे कि तेजस्वी यादव को राजनीतिक की कोई समझ नहीं है। उन्होंने चुनौती दी थी, तेजस्वी भले 10 -15 दिन का ट्यूशन ले लें, लेकिन कैमरे के सामने बिना कागज देखे, समाजवाद पर सिर्फ पांच मिनट तक बोल कर दिखाएं। वे तेजस्वी की योग्यता पर हमेशा सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि 2025 का चुनाव एनडीए बनाम जनसुराज का है। तेजस्वी समेत महागठबंधन को तीसरे नम्बर की पार्टी बताया था। अब उन्हें उसी तेजस्वी और महागठबंधन की जरूरत क्यों आन पड़ी है? क्यों कि वे किसी भी तरह से जीत का खाता खोलने के लिए तरस रहे हैं। उसूलों की राजनीति का दावा करने वाले प्रशांत किशोर क्या अब समझौतावादी हो गये हैं?
पीके को लेकर कांग्रेस और राजद में खटपट!
प्रशांत किशोर पहले कह चुके हैं कि वैचारिक रूप से वे कांग्रेस के अधिक नजदीक हैं। कांग्रेस भी उनके लिए सॉफ्ट कॉर्नर रखती है। जब प्रशांत किशोर ने बांकीपुर उपचुनाव के लिए महागठबंधन से समर्थन मांगा तो कांग्रेस सहर्ष राजी हो गयी, लेकिन राजद ने इनकार कर दिया। राजद ने अपना प्रत्याशी देने की बात कह कर कांग्रेस को झटका दे दिया। इस मुद्दे पर अब तो कांग्रेस और राजद में ही आपसी झगड़े की नौबत आ गयी है। राजद ने बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि प्रशांत किशोर विपक्ष के साझा उम्मीदवार नहीं होंगे। राजद के इस रुख को देखकर अब प्रशांत किशोर ने कहा कि वे अपने दम पर चुनाव लड़ रहे हैं। प्रशांत किशोर के अकेले लड़ने का अंजाम क्या होगा, ये तो 3 अगस्त को ही पता चलेगा।