राजस्थान का शक्ति पीठ! 2 हजार साल पुराने मंदिर में ग्रहण के दौरान भी नहीं बंद होते मां काली के कपाट

Didwana Temple Special: राजस्थान के डीडवाना शहर के भाटी बास में स्थित मां माता काली अखाड़ा केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि नाथ और शाक्त परंपरा की सदियों पुरानी साधना का जीवंत केंद्र माना जाता है. स्थानीय लोगों के अनुसार, यह सिद्ध शक्ति पीठ करीब दो हजार वर्ष पुराना है. लोगो ने बताया ये अखाड़ा पहले आभानगरी (डीडवाना) के उद्गम स्थल सिंघी बास के पास स्थापित हुआ था. यह अखाड़ा गुरु गोरखनाथ की परंपरा से जुड़ा हुआ है. इस अखाड़े हजारों सालों में अनेक सिद्ध योगियों की तपस्या और चमत्कारों को देखा है.

आज भी यहां महाकाली आदियोग स्किल पीठ के रूप में नियमित हवन, पूजा और साधना होती है. इस शक्ति पीठ की सबसे खास मान्यता अमर योगी राजा भर्तृहरि और योगी गोपीचंद से जुड़ी है. दोनों सिद्ध योगियों ने यहां मां काली की प्रतिमा के सामने बैठकर गुप्त साबर मंत्रों की कठोर साधना की थी. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां काली की पाषाण (पत्थर) प्रतिमा के चेहरे के भाव बदल गए और माता ने उनसे साक्षात संवाद किया.

योगियों ने हर 12वें वर्ष अदृश्य रूप में आने का वचन दिया
मान्यता है कि दोनों योगी राजा भर्तृहरि और गोपीचंद ने हर 12वें वर्ष अदृश्य रूप में इस स्थान पर आने का वचन दिया था. मंदिर से जुड़े लोगों का दावा है कि वर्ष 2001 में उन्हें सिंह के साथ मंदिर परिसर में विचरते देखा गया, जिसके बाद वे रहस्यमय तरीके से अंतर्ध्यान हो गए. इस पीठ का इतिहास कई संतों की तपस्या से भी जुड़ा हुआ है. परंपरा के अनुसार विक्रम संवत 1826 में योगी मनोहरनाथ ने यहां गुरुद्वारे की स्थापना की थी. वहीं बाद के समय में तपस्वी ओघड़ संत बंजीराम ने साबर साधना के दौरान छह माह तक बिना अन्न और जल के समाधि लगाई और यहीं जीवित समाधि ली.

सूर्य और चंद्र ग्रहण के दौरान खुले रहते हैं अखाड़ा में कपाट
इस अखाड़ा परिसर में मौजूद प्राचीन पीपल का वृक्ष आज भी उस तपस्या का साक्षी माना जाता है. यहां आने वाले श्रद्धालु भी इस पीपल को विशेष आस्था के साथ प्रणाम करते हैं. इस मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा सूर्य और चंद्र ग्रहण से जुड़ी है. जहां देश के अधिकांश मंदिर ग्रहण के सूतक काल में बंद कर दिए जाते हैं, वहीं मां माता काली अखाड़ा में कपाट खुले रहते हैं. इसका कारण शाक्त और तंत्र साधना से जुड़ी मान्यता है. माना जाता है कि ग्रहण काल को मंत्र सिद्धि और साधना के लिए सबसे श्रेष्ठ समय माना गया है. इसी वजह से ग्रहण के दौरान यहां विशेष साधना और पूजा-अर्चना की जाती है.

संगमरमर से भभूत जैसा पदार्थ रिसने लगा
मंदिर से जुड़ी एक और रहस्यमयी कथा वर्ष 1992 के जीर्णोद्धार से जुड़ी है. बताया जाता है कि नए संगमरमर के आंगन का निर्माण होने के बाद वहां से भभूत और पवित्र घृत जैसा पदार्थ रिसने लगा. इसे श्रद्धालुओं ने मां काली का चमत्कार माना और आज भी यह घटना स्थानीय लोगों के बीच आस्था और चर्चा का विषय बनी हुई है. डीडवाना के इस मां माता काली अखाड़े में पूरे देश से संत आते हैं. इसके अलावा श्रद्धालुओं की भी भीड़ उमड़ती है.