नई दिल्ली। ईरान अमेरिका के खिलाफ अपनी रक्षा रणनीति बदल रहा है. पहले वह अमेरिकी विमानों को आसमान में मारने की कोशिश करता था, लेकिन अब वह उनके रनवे और एयरबेस छीनने पर जोर दे रहा है. इस नई नीति को डिबेसिफिकेशन कहते हैं. इसका मतलब है कि दुश्मन के एयरबेस को इस्तेमाल के लायक न बनने देना.
आंकड़ों के हिसाब से यह रणनीति काम कर रही है. युद्ध से पहले अमेरिका ईरान के खिलाफ करीब 20 एयरबेस से ऑपरेशन चला सकता था. अब कुवैत, बहरीन, कतर, यूएई, सऊदी अरब और जॉर्डन जैसे देशों को हटा दें तो बचे सिर्फ पांच एयरबेस. इससे अमेरिकी सैन्य प्लानिंग बुरी तरह प्रभावित हो रही है.
डिबेसिफिकेशन की रणनीति में ईरान मिसाइलों और ड्रोन्स से एयरबेस के रनवे, टैक्सीवे और हैंगर को निशाना बनाता है. विमानों को मारने की बजाय उनके उड़ान भरने और लैंडिंग के आधार को खत्म कर देता है. इससे सैकड़ों विमान कुछ ही एयरबेस पर भीड़ बनकर रह जाते हैं. पार्किंग स्पेस कम होने से एक हमले में ज्यादा नुकसान हो सकता है.
लॉन्च डिटेक्शन से लेकर असर होने तक का समय इतना कम रह जाता है कि विमान उड़ान भरने से पहले ही प्रभावित हो सकते हैं. क्षेत्रीय देशों के एयरबेस कम होने से अमेरिका की पहुंच सीमित हो गई है. पहले ये बेस ईरान के करीब थे, जिससे कम ईंधन और ज्यादा समय हवा में रहने का फायदा मिलता था. अब विकल्प कम होने से अमेरिका को इजरायल या दूर के बेस पर निर्भर होना पड़ रहा है. इससे लॉजिस्टिक सिस्टम प्रभावित हो रहा है.
जॉर्डन पर हमले और फॉलबैक प्लान की असफलता
जॉर्डन को अमेरिका का बैकअप बेस माना जा रहा था. लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार एक हफ्ते में ईरान के चार हमलों में वहां कैजुअल्टीज हुईं और विमानों को नुकसान पहुंचा. मुवाफक साल्टी एयरबेस पर पर्सनल भी मारे गए. वीडियो फुटेज में इंटरसेप्शन रेट आधिकारिक दावों से काफी अलग दिख रहे हैं. इससे साफ है कि क्षेत्रीय सहयोगी अब पूर्ण सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं.
जॉर्डन जैसे देशों पर दबाव बढ़ने से अमेरिका को पीछे हटना पड़ रहा है. इससे रणनीतिक नुकसान हो रहा है. एयरबेस कम होने से विमानों की भीड़ बढ़ रही है. सिंगल हमले में ज्यादा एयरफ्रेम्स नष्ट होने का खतरा है.
अब अमेरिका को इजरायल से ऑपरेशन चलाने पड़ रहे हैं. ईरान की सीमा तक पहुंचने के लिए टैंकर विमानों को 1600 किलोमीटर से ज्यादा उड़ान भरनी पड़ रही है. अगर कैरियर एयरक्राफ्ट अरब सागर से 2735 किलोमीटरदूर से लॉन्च हो रहे हैं तो दूरी और बढ़ जाती है.
टैंकर कम पड़ने से लॉइटर टाइम घट रहा है. लॉइटर टाइम कम होने से ईरानी एयर डिफेंस को दबाना मुश्किल हो जाता है. डिफेंस दबाए बिना सस्ते बमों से हमला करना असंभव है. क्रूज मिसाइलों के स्टॉक पहले से ही कम हैं. इस स्थिति में हर मिशन ज्यादा खतरनाक और महंगा हो गया है.
अमेरिका के सामने मुश्किल विकल्प
अमेरिका के पास अब एक ही बड़ा विकल्प बचा है – ज्यादा नुकसान स्वीकार करना. पिछले कई दशकों में अमेरिका ने इतने नुकसान नहीं स्वीकार किए हैं. अगर अमेरिका ज्यादा विमान और पायलटों के नुकसान को स्वीकार करता है तो ऑपरेशन जारी रख सकता है. लेकिन घरेलू राजनीति, जनमत और सैन्य रणनीति में यह आसान नहीं होगा. दूसरी ओर, पीछे हटने से ईरान को फायदा होगा और क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ सकता है.
डिबेसिफिकेशन ने पारंपरिक एयर पावर एडवांटेज को चुनौती दी है. ईरान ने दिखाया है कि महंगे विमानों को मारने की बजाय सस्ते मिसाइलों से बेस को निशाना बनाना ज्यादा प्रभावी हो सकता है. इससे पूरे मिडिल ईस्ट में अमेरिकी बेस की उपयोगिता पर सवाल उठ रहे हैं.
क्षेत्रीय देश भी अब अमेरिकी बेस होने के जोखिम को समझ रहे हैं. वे ईरान से टकराव नहीं चाहते. इससे अमेरिका की फॉरवर्ड बेसिंग स्ट्रैटजी कमजोर पड़ रही है. लंबी दूरी के ऑपरेशन ईंधन, रखरखाव और पायलट थकान बढ़ाते हैं. इससे मिशन की सफलता दर भी प्रभावित होती है.
ईरान की यह रणनीति एसिमेट्रिक वॉरफेयर का उदाहरण है. कम संसाधनों वाले देश मजबूत देश की ताकत को कैसे कम कर सकते हैं, यह इसका सबूत है. अमेरिका को अब नई टेक्नोलॉजी, डिस्पर्स्ड बेसिंग और तेज लॉजिस्टिक पर सोचना होगा.
ईरान की डिबेसिफिकेशन रणनीति अमेरिकी सैन्य प्लानिंग को नया चुनौती दे रही है. एयरबेस कम होने, लंबी दूरी, टैंकर की कमी और लॉइटर टाइम घटने से ऑपरेशन जटिल हो गए हैं. जॉर्डन पर हमले ने बैकअप प्लान को भी प्रभावित किया है. अब अमेरिका को भारी नुकसान स्वीकार करने या रणनीति बदलने का फैसला करना है.
यह स्थिति दिखाती है कि आधुनिक युद्ध में सिर्फ हथियारों की संख्या नहीं, बल्कि बेस, लॉजिस्टिक्स और राजनीतिक इच्छाशक्ति भी निर्णायक होती है. आने वाले दिनों में मिडिल ईस्ट की सुरक्षा स्थिति इसी रणनीति से प्रभावित रहेगी.