शिमला: हिमाचल विधानसभा के मानसून सेशन में शुक्रवार को राज्य की वित्तीय स्थिति पर रखी गई कैग रिपोर्ट ने चिंताजनक हालात सामने लाए हैं। यह रिपोर्ट नियंत्रक महालेखा परीक्षक ने चार जुलाई, 2025 को राज्य सरकार को भेजी थी। रिपोर्ट वित्त वर्ष 2023-24 की है। रिपोर्ट कहती है कि राज्य में ऋणों की देनदारी और सकल घरेलू उत्पाद के बीच अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है, जो पिछले चार साल में 39.09 फीसदी से बढक़र 43.98 फीसदी हो गया। वर्ष 2023-24 के अंत तक कुल ऋण एवं देयताएं भी 95,633 करोड़ की हो गई थीं। राज्य न तो वित्तायोग के वित्तीय बैंचमार्क पूरे कर पा रहा है, न ही एफआरबीएम एक्ट के प्रावधन। वर्ष 2023-24 में ही लोन लिमिट 6342 करोड़ थी, लेकिन लोन 9043 करोड़ के लिए गए।
रिपोर्ट कहती है कि लोन चुकाने के लिए राज्य ने वर्ष 2019 में लोक ऋण यानी पब्लिक डेबिट का 52.99 प्रतिशत हिस्सा खर्च किया था। यह वर्ष 2024 में बढ़ कर 74.11 प्रतिशत हो गया। यानी हिमाचल लोन उठाकर लोन ही भर रहा है। रिपोर्ट में हिमाचल में बहाल की गई ओपीएस यानी ओल्ड पेंशन का जिक्र भी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमाचल सरकार ने ओपीएस की बहाली कर पहली अप्रैल, 2023 से इसे लागू किया है। इससे अर्थव्यवस्था पर आने वाले समय में दबाव पड़ेगा। कैग रिपोर्ट में कहा गया है कि ओपीएस लागू करने के बाद हिमाचल सरकार को आने वाले समय में राज्य की डेबिट सस्टेनेबिलिटी यानी कर्ज को धारण करने की क्षमता का आकलन करना होगा।
जीडीपी का 70 फीसदी वेतन पेंशन और ब्याज पर खर्च
हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2019-20 से 2023-24 तक सकल घरेलू उत्पाद का 64 से 70 प्रतिशत हिस्सा ब्याज, पेंशन व वेतन आदि के भुगतान पर खर्च होता रहा। वर्ष 2019-20 में इन मदों पर 21466 करोड़ रुपए खर्च हुए। इसके मुकाबले वर्ष 2023-24 में इन मदों पर 30213 करोड़ की रकम खर्च की गई। इस तरह इतनी अवधि में यह बढ़ोतरी 8.82 प्रतिशत रही है।
कैग ने गिनाईं बड़ी खामियां
राज्य सरकार केंद्र से प्राप्त 1024 करोड़ रुपए की रकम खर्च ही नहीं कर पाई। ये नोडल एजेंसी के खाते में अप्रयुक्त पड़ी रही। सरकार ने 14 मामलों में 711 करोड़ का अनुपूरक बजट पारित किया, लेकिन मूल बजट में तय रकम खर्च नहीं हुई। राजकोषीय घाटा एफआरबीएम एक्ट के अंतर्गत तय 3.5 प्रतिशत तक रहना चाहिए था, लेकिन यह 5.43 प्रतिशत रहा है।