नई दिल्ली: ईरान-इजरायल के बीच जंग थमने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। इस युद्ध में अमेरिका भी इजरायल के साथ है। वहीं यह जंग खाड़ी देशों पर पहुंच गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि यह युद्ध लंबा चल सकता है। इसके कारण क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त तेजी आ सकती है। इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दे सकता है।
ईरान-इजरायल संघर्ष का आज नौवां दिन है। संघर्ष शुरू होने से पहले कच्चे तेल की कीमत करीब 62 डॉलर प्रति बैरल थी। एक हफ्ते में क्रूड ऑयल की कीमतों में तेज उछाल आया है। शुक्रवार को तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं। अमेरिकी कच्चे तेल वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) का भाव 90.90 डॉलर पर स्थिर हुआ, जो एक सप्ताह पहले की तुलना में 36% अधिक है। वहीं अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत सप्ताह भर में 27% बढ़कर 92.69 डॉलर पर पहुंच गई।
होर्मुज जलडमरूमध्य मुख्य मार्ग
खाड़ी देशों से आने वाला तेल होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर आता है। यह क्षेत्र से ईरान का बॉर्डर गुजरता है। युद्ध को देखते हुए ईरान ने इस रास्ते पर काफी बंदिशें लगा दी हैं। वैश्विक तेल शिपमेंट का 20-25% हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। वहीं भारत का क्रूड ऑयल आयात का आधा हिस्सा भी इसी रास्ते से गुजरता है। यहां तनाव बढ़ने से न केवल आपूर्ति रुकने का डर है, बल्कि शिपिंग इंश्योरेंस और माल ढुलाई के खर्च भी बढ़ गए हैं, जिसे ‘वॉर प्रीमियम’ कहा जा रहा है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण पर्शियन गल्फ से गुजरने वाले जहाजों के बीमा प्रीमियम में तेज बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। क्षेत्र में बढ़ते युद्ध जोखिम के कारण शिपिंग कंपनियों और कार्गो मालिकों की लागत काफी बढ़ सकती है। मौजूदा संघर्ष के कारण पहले से लागू वॉर रिस्क प्रीमियम अब पर्याप्त नहीं माने जा रहे हैं। विष्य में बीमा कवर फिर से उपलब्ध हो सकता है, लेकिन इसके लिए जहाज मालिकों और कार्गो कंपनियों को काफी अधिक प्रीमियम चुकाना पड़ सकता है।
भारत की निर्भरता
भारत अपनी जरूरत का लगभग 50% कच्चा तेल मिडिल ईस्ट से आयात करता है।
भारतीय रिफाइनरियां मुख्य रूप से मिडिल ईस्टर्न क्रूड को प्रोसेस करने के लिए ही डिजाइन की गई हैं।
भारत के पास 25-30 दिनों का रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व है, लेकिन यह केवल आपात स्थिति के लिए है।
भारत पर क्या और कितना असर?
तेल की कीमतों में हाल ही में प्रति बैरल 10 से 15 डॉलर की वृद्धि देखी गई है। इसका असर आने वाले समय में देश के विकास के आंकड़ों में दिखाई देगा। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आने वाली हर 10 डॉलर की तेजी भारत की जीडीपी ग्रोथ में करीब 0.5 प्रतिशत की कटौती कर सकती है। ऐसे में देश में महंगाई देखने को मिल सकती है।
क्या 150 डॉलर तक जाएगी तेल की कीमत?
हाल ही में अगेन कैपिटल के पार्टनर जॉन किल्डफ (John Kilduff) ने कहा था कि तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। वहीं कतर के ऊर्जा मंत्री ने फाइनेंशियल टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि उन्हें उम्मीद है कि खाड़ी के सभी ऊर्जा उत्पादक कुछ ही हफ्तों में एक्सपोर्ट बंद कर देंगे। इससे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। अगर ऐसा होता है तो भारत में महंगाई बहुत बढ़ जाएगी और अर्थव्यवस्था पटरी से उतर सकती है।