पटना: बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है. ‘सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम’की एक रिपोर्ट में बिहार के हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर और आईसीयू मैनेजमेंट को लेकर चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं. बिहार में मेडिकल अटेंशन के अभाव और ‘गलत इलाज’ से मौतों का आंकड़ा 67.8 फीसदी है. जो कि देश में सबसे खराब स्थिति में है. बिहार में सालाना लगभग 4.96 लाख इस तरह की मौत के शिकार हो रहे हैं.
बिहार में ये कैसा इलाज? : पूर्णिया में कथित गलत इंजेक्शन से एक बच्चे की मौत, भागलपुर में यूट्यूब देखकर किए गए ऑपरेशन के बाद महिला की जान जाने और शिवहर में घायल दारोगा के असामान्य इलाज जैसे मामलों ने बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौतियों को उजागर किया है.
SRS की रिपोर्ट में क्या? : इसी बीच एसआरएस रिपोर्ट 2024 में खुलासा हुआ है कि राज्य में 67.8 प्रतिशत लोगों की मौत से पहले उन्हें प्रशिक्षित चिकित्सकीय देखरेख नहीं मिल सकी. रिपोर्ट ने स्वास्थ्य तंत्र की जमीनी हकीकत और ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा सेवाओं की उपलब्धता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
ग्रामीण क्षेत्रों में झोलाछाप पर निर्भरता : रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में बड़ी संख्या में लोगों की मौत ऐसे हालात में हुई, जब उन्हें प्रशिक्षित चिकित्सकों की देखरेख नहीं मिल सकी. ग्रामीण क्षेत्रों में झोलाछाप चिकित्सकों पर निर्भरता, डॉक्टरों की कमी और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोर स्थिति इस संकट की बड़ी वजह मानी जा रही है.
पूर्णिया में कथित गलत इलाज से मासूम की मौत : पूर्णिया जिले के नगर थाना क्षेत्र के सौरा गांव में 10 वर्षीय लखन कुमार की मौत ने ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी. परिजनों का आरोप है कि एक झोलाछाप चिकित्सक द्वारा गलत इंजेक्शन देने के कारण बच्चे की जान चली गई. घटना के बाद आरोपी क्लीनिक बंद कर फरार हो गया. पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.
शिवहर में घायल दारोगा के इलाज पर उठे सवाल: अप्रैल 2026 में शिवहर जिले के फतेहपुर में सड़क दुर्घटना में घायल हुए दारोगा श्यामलाल के इलाज का मामला भी चर्चा में रहा. सदर अस्पताल में उनके फ्रैक्चर पैर को कथित तौर पर गत्ते और सलाइन पाइप की सहायता से बांधा गया. तस्वीरें सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया और प्रशासन ने जांच के आदेश दिए.
भागलपुर में यूट्यूब देखकर सिजेरियन का आरोप : भागलपुर में सामने आए एक मामले ने पूरे राज्य को झकझोर दिया. आरोप है कि एक अप्रशिक्षित व्यक्ति ने मोबाइल पर यूट्यूब वीडियो देखकर गर्भवती महिला का सिजेरियन ऑपरेशन किया, जिसके बाद उसकी मौत हो गई. घटना के बाद परिजनों और ग्रामीणों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया और स्वास्थ्य विभाग को जांच शुरू करनी पड़ी.
एसआरएस रिपोर्ट ने बढ़ाई सरकार की चिंता : सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में 67.8 प्रतिशत मौतें ऐसी परिस्थितियों में हुईं, जहां मरीजों को मृत्यु से पहले प्रशिक्षित चिकित्सकीय सहायता नहीं मिली. यह आंकड़ा देश के कई राज्यों की तुलना में अधिक बताया जा रहा है और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
बिहार की स्थिति चिंताजनक : रिपोर्ट में ‘डेथ्स विदाउट मेडिकल अटेंशन’ श्रेणी के तहत उन मामलों को शामिल किया गया है, जहां मरीज की मृत्यु के दौरान किसी प्रशिक्षित डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी की देखरेख उपलब्ध नहीं थी. बिहार में यह आंकड़ा 67.8 प्रतिशत दर्ज किया गया, जो स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और पहुंच दोनों पर चिंता पैदा करता है.
ग्रामीण इलाकों में स्थिति और गंभीर: एसआरएस रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण बिहार में लगभग 69.4 प्रतिशत मौतें ऐसी रहीं, जहां लोगों को प्रशिक्षित चिकित्सक की देखरेख नहीं मिली. वहीं शहरी क्षेत्रों में भी यह आंकड़ा 58.1 प्रतिशत रहा. यह अंतर ग्रामीण स्वास्थ्य तंत्र की कमजोरियों को स्पष्ट करता है.
डॉक्टरों की कमी भी बड़ी चुनौती : नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की पूर्व ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार बिहार में डॉक्टरों की संख्या आवश्यकता से काफी कम रही है. राज्य में डॉक्टर जनसंख्या अनुपात राष्ट्रीय औसत से कमजोर बताया गया है. विशेषज्ञ मानते हैं कि स्वास्थ्य संस्थानों में रिक्त पद और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी भी इस समस्या की प्रमुख वजह है.
झोलाछाप चिकित्सकों पर निर्भरता का सवाल : ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी आबादी आज भी प्राथमिक इलाज के लिए अप्रशिक्षित चिकित्सकों पर निर्भर है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता और डॉक्टरों की कमी के कारण लोग मजबूरी में ऐसे विकल्पों का सहारा लेते हैं, जिससे कई बार गंभीर परिणाम सामने आते हैं.
विशेषज्ञों ने सुझाए सुधार के उपाय : प्रसिद्ध चिकित्सक और पद्मश्री सम्मानित डॉ. हेमंत ने कहा कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है. उनका मानना है कि स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण, विशेषज्ञों की निगरानी और जमीनी स्तर पर अध्ययन के आधार पर नीतिगत फैसले लिए जाने चाहिए.
”जो हमारे हेल्थ वर्कर या झोलाछाप डॉक्टर हैं, उनको और ट्रेंड किए जाने की जरूरत है. जो आंकड़े सामने आए हैं, वह बेहद चिंताजनक हैं. आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण होना चाहिए. सरकार को एक जांच कमेटी
बननी चाहिए और जांच कमेटी में विशेषज्ञों को जगह दिया जाना चाहिए विशेषज्ञ घटनास्थल पर जाएं और जाकर रिपोर्ट दें और रिपोर्ट के आधार पर सरकार को कार्यवाही करनी चाहिए.”- डॉ हेमंत, पद्मश्री और प्रसिद्ध चिकित्सक
स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार की जरूरत पर जोर: चिकित्सक डॉ. सुनील का कहना है कि राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में पिछले वर्षों में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक स्वास्थ्य तंत्र को संतुलित रूप से मजबूत करना अभी भी जरूरी है. उनका मानना है कि पीएचसी से लेकर मेडिकल कॉलेज तक स्वास्थ्य सेवाओं की एक मजबूत श्रृंखला विकसित करनी होगी.
”झोलाछाप डॉक्टर को कम्युनिटी हेल्थ वर्कर कहा जाता है. प्राइमरी, सेकेंडरी और टर्शरी हेल्थ सिस्टम को दुरुस्त करने की जरूरत है. पीएचसी को उतना ही दुरुस्त किया जाना है, जितना कि जिला अस्पताल मजबूत है. जिला अस्पताल को उतना ही मजबूत होना है, जितना कि मेडिकल कॉलेज मजबूत है. इस फार्मूले पर सरकार को कम करना चाहिए.”- डॉ सुनील, वरिष्ठ चिकित्सक
एक्शन मोड में सरकार : रिपोर्ट और हालिया घटनाओं के बाद स्वास्थ्य विभाग भी सक्रिय नजर आ रहा है. स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने विभागीय अधिकारियों को कमियों को दूर करने के निर्देश दिए हैं. उन्होंने स्पष्ट किया है कि तय समयसीमा में सुधार नहीं होने पर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.
स्वास्थ्य ढांचे को सुधार की जरूरत: डॉक्टरों की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सेवाओं की सीमित पहुंच और अप्रशिक्षित या झोलाछाप डॉक्टर्स पर बढ़ती लोगों की निर्भरता जैसे मुद्दों पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत किए बिना स्थिति में बड़ा सुधार संभव नहीं होगा.
क्या है मेडिकल अटेंशन का अभाव?: ‘गलत इलाज’ की जगह सरकारी रिपोर्ट के टर्म में आशय है कि 4.96 लाख लोगों की मौत अस्पताल पहुंचने से पहले घर में, रास्ते में या फिर झोलाछाप डॉक्टर या संस्थान की देखरेख में हुई है. कैग रिपोर्ट में भी इसकी पुष्टि हुई है, जिसमें ग्रामीण इलाकों में पीएचसी के अंदर डॉक्टरों की कमी की वजह से लोग समय पर इलाज नहीं ले पाते.