बिहार के 33 जिलों में ‘सवर्ण’ घोषित हुए खतरा! 86% इलाकों में सामान्य वर्ग के लिए हथियार लाइसेंस पर पाबंदी

UGC New Rules 2026: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों ने देश में घमासान मचा दिया है. एक तरफ संविधान का अनुच्छेद 14 समानता की बात करता है तो दूसरी तरफ यूजीसी की नई गाइडलाइन किसी भी तरह से समानता का अधिकार का पालन करती नहीं दिख रही है. यूजीसी गाइडलाइन तो सवर्णों के लिए खतरनाक है ही, मोदी सरकार ने बिहार के 38 में 33 जिलों को एट्रोसिटी संभावित क्षेत्र घोषित कर दिया है. इन क्षेत्रों में सामान्य वर्ग के किसी भी व्यक्ति को हथियारों का लाइसेंस नहीं दिया जा सकता. इसके उलट अनुसूचित जाति और जनजाति को बिना जांच पड़ताल के हथियार लाइसेंस दिए जाने का प्रावधान है. सरकार की यह कवायद यह जाहिर करना चाहती है कि सवर्णों से अनुसूचित जाति और जनजाति को खतरा है, लेकिन अनुसूचित जाति और जनजाति से सवर्णों को कोई खतरा नहीं है.

वैसे यह नियम 1995 में बनाया गया था. इसका उद्देश्य समाज के सबसे कमजोर वर्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करना और हिंसा को रोकना था. हालांकि, तब की स्थिति के हिसाब से आज भी राज्य सरकारें हर साल गृह मंत्रालय और सामाजिक न्याय मंत्रालय को एक रिपोर्ट भेजती हैं और इसके बाद केंद्र सरकार की ओर से किसी क्षेत्र को ‘एट्रोसिटी संभावित क्षेत्र’ घोषित किया जाता है. मोदी सरकार ने बिहार के 38 में से 33 जिले एट्रोसिटी संभावित क्षेत्र घोषित कर दिए गए हैं. इसका मतलब यह हुआ कि बिहार के 86.84 प्रतिशत क्षेत्रों में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सवर्ण बड़ा खतरा हैं.

इन जिलों में पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, भभुआ, गयाजी, सीतामढ़ी, नालंदा, शिवहर, शेखपुरा, बक्सर, सारण, बांका, सुपौल, लखीसराय, वैशाली, दरभंगा, समस्तीपुर, सहरसा, किशनगंज, बेगूसराय, रोहतास, जहानाबाद, भोजपुर, मुजफ्फरपुर, सीवान, मधुबनी, मधेपुरा, भागलपुर, पटना, गोपालगंज, पूर्णिया, नवादा, मुंगेर और औरंगाबाद जिला शामिल है.

सरकार की इस पॉलिसी के हिसाब से अगर इन जिलों में कोई बड़ा दंगा हो जाए, तो सवर्ण आबादी अपनी रक्षा तक नहीं कर सकती है. इन तमाम बातों को देखते हुए वरिष्ठ पत्रकार अभय कुमार कहते हैं कि सरकार जो कर रही है, उससे सवर्ण जीवन भर इस बात के लिए पछताता रहेगा कि आखिर वो किसी सवर्ण के घर पैदा ही क्यों हुआ?