बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले क्या सियासी बयार बदलने लगी है. हाल ही में आए एक चुनाव पूर्व सर्वे ने राज्य की राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है. लोक पोल (Lok Poll) के सर्वे के अनुसार, बिहार चुनाव में आरजेडी नीत महागठबंधन (MGB) को 118 से 126 सीटें मिलने की संभावना है, जबकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) 105 से 114 सीटों तक सिमट सकता है.
यह सर्वे तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और उसके सहयोगियों के लिए एक बड़ा बढ़ावा माना जा रहा है, जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (JDU) और बीजेपी की अगुवाई वाले NDA के लिए यह एक चेतावनी हो सकता है.
इस सर्वे को देखकर सवाल उठ रहा है कि क्या नीतीश कुमार की तमाम चुनावी रेवड़ियां फेल हो रही हैं? आइए, इस सर्वे और बिहार की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों पर विस्तार से नजर डालते हैं.
वोट शेयर की बात करें तो महागठबंधन को 39% से 42% वोट मिलने का अनुमान है, जबकि एनडीए को 38% से 41% वोट मिल सकते हैं. यह अंतर वैसे तो बेहद कम है, लेकिन सीटों की संख्या में महागठबंधन का बढ़त लेना तेजस्वी यादव के लिए एक बड़ा नैरेटिव सेट करता है.
सर्वे में यह भी बताया गया है कि राहुल गांधी की वोटर अधीकार यात्रा और एनडीए नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोपों ने वोटरों के मन में बदलाव लाया है. युवा और पहली बार वोट डालने वाले मतदाता महागठबंधन की ओर ज्यादा झुकाव दिखा रहे हैं. इसमें एक बड़ा वर्ग तेजस्वी यादव की ‘नौकरी देने वाली सरकार’ के वादे से प्रभावित हैं.
क्या नीतीश कुमार की रेवड़ियां हो रही हैं फेल?
नीतीश कुमार की सरकार ने पिछले कुछ महीनों में कई वेलफेयर स्कीम्स की घोषणा की है, जैसे बुजुर्ग और विधवा महिलाओं के लिए मासिक भत्ता, बेरोजगार युवाओं के लिए मासिक सहायता और 125 यूनिट मुफ्त बिजली… इन चुनावी रेवड़ियों पर राज्य का सालाना खर्च 40,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना है, जो राज्य की कुल राजस्व प्राप्ति का लगभग 70% है.
क्या ये रेवड़ियां वोटरों को लुभा पा रही हैं?
लोक पोल सर्वे के नतीजे इशारा करते हैं कि इन स्कीम्स का असर सीमित रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि वेलफेयर स्कीम्स लंबे समय में प्रभाव डालती हैं, लेकिन चुनाव से ठीक पहले इनकी घोषणा वोटरों को ज्यादा प्रभावित नहीं करती, खासकर जब विपक्ष नौकरी और विकास के मुद्दे पर आक्रामक हो.
क्या बदल रही है बिहार की सियासी बयार?
बिहार की राजनीति लंबे समय से जाति, वर्ग, और क्षेत्रीय समीकरणों पर आधारित रही है. नीतीश कुमार ने 2005 से इन समीकरणों को संतुलित करके अपनी सरकार बनाई है, लेकिन 2025 के चुनाव में ये समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं. लोक पोल के सर्वे में यह सामने आया है कि युवा वोटर और महिलाएं इस बार महागठबंधन की ओर ज्यादा झुकाव दिखा रहे हैं. राहुल गांधी की वोटर अधीकार यात्रा ने भी महागठबंधन के पक्ष में माहौल बनाया है.
वहीं, NDA की ओर से बीजेपी और जेडीयू के बीच समन्वय की कमी भी वोटरों को प्रभावित कर रही है. नीतीश कुमार की बार-बार गठबंधन बदलने की रणनीति ने उनकी विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुंचाया है. इसके उलट तेजस्वी यादव ने ‘जंगल राज’ के आरोपों का जवाब देते हुए विकास और नौकरी के एजेंडे पर फोकस किया है, जो वोटरों को आकर्षित कर रहा है.