पटना: बिहार की राजनीति के गलियारों से बड़ी खबर सामने आ रही है. राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का सबसे मुखर, प्रखर और पढ़ा-लिखा चेहरा रहीं रितु जायसवाल अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थामने जा रही हैं. बता दें कि रितु जायसवाल तेजस्वी यादव की बेहद करीबी रही हैं और पार्टी की मुख्य राज्य प्रवक्ता और आरजेडी महिला सेल की प्रदेश अध्यक्ष पद पर भी योगदान दिया है. ऐसे में राजनीति के जानकारों की नजर में रितु जायसवाल का पाला बदलना महज एक दलबदल नहीं है, बल्कि इसे बिहार की विपक्षी राजनीति और खासकर राष्ट्रीय जनता दल के लिए एक बहुत बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा है.
टिकट कटने और राजद के निष्कासन से बढ़ी थी कड़वाहट
सूत्रों के अनुसार, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ रितु जायसवाल की उच्च स्तरीय बातचीत पूरी तरह फाइनल हो चुकी है और वे जल्द ही आधिकारिक तौर पर भगवा चोला ओढ़ लेंगी. बता दें कि बीते विधानसभा चुनाव में रितु जायसवाल और लालू परिवार के बीच कड़वाहट चरम पर पहुंच गई थी.इसके पीछे का कारण पार्टी नेतृत्व का रितु जायसवाल की उपेक्षा किया जाना बताया जा रहा है.
टिकट कटने के बाद बढ़ी राजद से दूरी
दरअसल, रितु जायसवाल ने सीतामढ़ी जिले की परिहार विधानसभा सीट पर पांच साल तक लगातार पसीना बहाया था और वे वहां से आरजेडी के टिकट की स्वाभाविक दावेदार थीं. हालांकि, ऐन वक्त पर तेजस्वी यादव के रणनीतिकारों ने उनकी दावेदारी को दरकिनार करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता रामचंद्र पूर्वे की बहू स्मिता गुप्ता को मैदान में उतार दिया. इस फैसले से आहत होकर रितु ने बगावत की और निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गईं. इसके बाद राजद ने उन्हें दल-विरोधी आचरण के आरोप में 6 साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था.
बता दें कि निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़कर रितु जायसवाल ने आरजेडी नेतृत्व के घमंड को जमीन पर तोड़ा और अपनी राजनीतिक ताकत का लोहा मनवाया. चुनावी नतीजों में वे 65,455 भारी-भरकम वोट लाकर दूसरे स्थान पर रहीं. वहीं दूसरी तरफ, आरजेडी की आधिकारिक उम्मीदवार स्मिता गुप्ता महज 48,534 वोटों पर सिमटकर तीसरे नंबर पर चली गईं. इस त्रिकोणीय मुकाबले का सीधा फायदा भाजपा की गायत्री देवी को मिला, जिन्होंने 82,644 वोट हासिल कर सीट पर कब्जा जमाया. इस चुनाव ने साफ कर दिया कि परिहार और शिवहर क्षेत्र में आरजेडी के पारंपरिक कोर वोटर से ज्यादा रितु जायसवाल का अपना व्यक्तिगत जनाधार मजबूत है.
रितु जायसवाल: एक मुखिया से बड़ी पहचान तक
रितु जायसवाल का राजनीतिक सफर बेहद प्रेरणादायक और विशेष रहा है. दिल्ली की आलीशान और आरामदायक जिंदगी और अपने पति की आईएएस (IAS) स्तर की नौकरी की पृष्ठभूमि को छोड़कर वे बिहार के पिछड़े ग्रामीण इलाकों को बदलने के संकल्प के साथ लौटी थीं. सीतामढ़ी की सिंहवाहिनी ग्राम पंचायत की मुखिया के रूप में उन्होंने विकास के ऐसे अभूतपूर्व मॉडल पेश किए कि उन्हें भारत सरकार द्वारा ‘सर्वश्रेष्ठ मुखिया’ के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया. उनकी इसी प्रशासनिक क्षमता, जमीनी पकड़ और टीवी डिबेट्स में विरोधियों के छक्के छुड़ाने वाली प्रखर भाषण शैली को देखकर तेजस्वी यादव ने उन्हें पार्टी का मुख्य चेहरा बनाया था. वे आरजेडी की उन गिनी-चुनी नेताओं में से थीं जो युवाओं और आधी आबादी के बीच बेहद लोकप्रिय थीं.
राजद के लिए यह क्यों है सबसे बड़ा झटका?
संभावित राजनीतिक घटनाक्रम तेजस्वी यादव की लंबी राजनीतिक रणनीति को पूरी तरह ध्वस्त करने जैसा है.
‘A to Z’ समीकरण का पतन: तेजस्वी यादव पिछले कुछ समय से आरजेडी की केवल ‘माय’ (MY – मुस्लिम+यादव) वाली छवि को बदलकर ‘ए टू जे़ड’ यानी सभी जातियों की पार्टी बनाने का दावा कर रहे थे. रितु जायसवाल इस नए नैरेटिव का सबसे मजबूत गैर-यादव चेहरा थीं. उनके जाने से आरजेडी की इस सोशल इंजीनियरिंग को गहरा धक्का लगा है.
वैश्य समाज में सेंधमारी का रास्ता बंद: रितु जायसवाल वैश्य समुदाय (कलवार) से आती हैं, जो बिहार में एक बेहद प्रभावी और बड़ी आबादी वाला आर्थिक समूह है. यह वर्ग पारंपरिक रूप से भाजपा का कोर वोटर माना जाता है. आरजेडी ने रितु को आगे बढ़ाकर इस वोट बैंक में सेंध लगाने की बड़ी तैयारी की थी, जो अब पूरी तरह विफल हो गई है.
कैसे पूरी तरह बदल जाएगा क्षेत्र का सियासी समीकरण?
रितु जायसवाल के भाजपा में आने से सीतामढ़ी, शिवहर, मुजफ्फरपुर और पूरे तिरहुत प्रमंडल के राजनीतिक समीकरण में एक बड़ा भूचाल आना तय है. अब तक इस क्षेत्र में भाजपा के पास कोई ऐसा तेजतर्रार महिला चेहरा नहीं था जो सीधे जनता से जुड़ा हो. रितु के आने से भाजपा न केवल अपने वैश्य वोट बैंक को और अधिक मजबूत और लामबंद करेगी, बल्कि महिलाओं के बीच भी अपनी पैठ को नई ऊंचाई देगी.
रितु जायसवाल के BJP में जाने से RJD को कितना नुकसान होगा?
दूसरी ओर, शिवहर और सीतामढ़ी बेल्ट में अब आरजेडी के पास जमीन पर लड़ने वाला कोई दूसरा बड़ा और प्रभावशाली गैर-यादव चेहरा नहीं बचा है, जिससे आगामी लोकसभा और स्थानीय चुनावों में भाजपा को इस पूरे क्षेत्र में एकतरफा बढ़त मिलने की संभावना प्रबल हो गई है. जानकारों का मानना