पटना. क्या बिहार में नीतीश कुमार का जादू फीका पड़ रहा है और ब्रांड मोदी की लहर बिहार सरकार की एंटी इंकंबेंसी को पछाड़कर एनडीए को एक बार फिर बिहार में सत्ता के शीर्ष पर बिठा देगी? ताजा सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, सत्ता का मुकुट बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) पहनता दिख रहा है और बीजेपी की सीटों में उछाल दिख रहा है. वहीं, दूसरी ओर नीतीश कुमार का जदयू अपना पिछला प्रदर्शन भी दोहराता हुआ नहीं दिख रहा है. बिहार विधानसभा चुनाव से पहले आए इस सर्वे रिपोर्ट में एनडीए को बहुमत से काफी अधिक सीटों के साथ सत्ता में वापसी का अनुमान लगाया गया है, जबकि महागठबंधन डबल डिजिट में ही सीमित रहने की बात कही गई है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या नीतीश का प्रभाव कम हो रहा है और पीएम मोदी की अगुवाई में बीजेपी बिहार में हावी हो रही है?
दरअसल, टाइम्स नाउ-जेवीसी के जनमत सर्वेक्षण ने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए को 136 सीटों के साथ सत्ता में वापसी का दावेदार बताया है जो 243 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत (122) से कहीं अधिक है. सर्वे के मुताबिक, बीजेपी को 64 सीटों पर जीत और 17 पर बढ़त के साथ पिछली बार 74 सीटों की तुलना में कुल 81 सीटें मिल सकती हैं. वहीं, नीतीश कुमार की जद(यू) को 29 सीटों पर जीत और 2 पर बढ़त के साथ अधिकतम 31 सीटें मिलने का अनुमान है जो 2020 की 43 सीटों से 12 कम है.
जदयू की कमजोर होती स्थिति
सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, नीतीश कुमार की जदयू का प्रभाव लगातार कम हो रहा है. 2015 में 71 सीटों से 2020 में 43 और अब 31 सीटों का अनुमान इसकी घटती लोकप्रियता को दर्शा रहा है. जानकारों का मानना है कि नीतीश की बार-बार गठबंधन बदलने की रणनीति, खासकर 2022 में RJD और 2024 में फिर NDA के साथ जाना मतदाताओं में अविश्वास पैदा कर रहा है. इसके अलावा, नीतीश कुमार की उम्र और स्वास्थ्य संबंधी चर्चाएं भी उनकी सक्रियता पर सवाल उठा रही हैं.
बिहार में बीजेपी की बढ़ती ताकत
दूसरी ओर, बीजेपी बिहार में अपनी स्थिति मजबूत कर रही. सर्वे में उसकी सीटों में सात की बढ़ोतरी और हाल के दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में जीत ने कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाया है. पीएम मोदी की रैलियां और बिहार के लिए बजट में विशेष पैकेज ने ग्रामीण और शहरी मतदाताओं को लुभाया है. बीजेपी की रणनीति OBC और EBC वोटरों को साधने के साथ-साथ हिंदुत्व और विकास के मुद्दों पर केंद्रित रही है.
नीतीश की चुनौतियां और आलोचनाएं
नीतीश कुमार की छवि ‘विकास पुरुष’ की रही है, लेकिन हाल के वर्षों में उनकी गठबंधन की अस्थिरता और प्रशासनिक कमजोरियां चर्चा में हैं. प्रशांत किशोर जैसे नेताओं ने नीतीश कुमार को ‘थका हुआ और मानसिक रूप से रिटायर्ड’ करार दिया है. वहीं, तेजस्वी यादव भी अक्सर नीतीश कुमार के लिए ‘अचेत मुख्यमंत्री’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं.इसके साथ ही बिहार में बेरोजगारी (51.2%) और महंगाई (45.7%) जैसे मुद्दे मतदाताओं के बीच असंतोष बढ़ा रहे हैं जिसका खामियाजा जद(यू) को भुगतना पड़ सकता है.
महागठबंधन की गिरती हुई स्थिति
RJD के नेतृत्व वाला महागठबंधन 75 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष के रूप में उभर सकता है.तेजस्वी यादव की ‘माई बहन मान योजना’ और मुफ्त बिजली जैसे वादों ने युवा और OBC मतदाताओं को आकर्षित किया है. कांग्रेस की पैदल यात्राएं और राहुल गांधी की रैलियां भी महागठबंधन को ताकत दे रही हैं. हालांकि, सर्वे में इनके बहुमत से काफी पीछे रहने का अनुमान है जो बीजेपी की रणनीतिक बढ़त को दर्शाता है. हालांकि, RJD की युवा छवि और तेजस्वी यादव की आक्रामक रणनीति भी जद(यू) और बीजेपी के लिए चुनौती है.
सियासी समीकरण और भविष्य
बीजेपी और जद(यू) के बीच सीट बंटवारे पर चर्चा चल रही है. ऐसा माना जा रहा है कि बीजेपी 100 और जद(यू) 90-95 सीटों पर लड़ सकती है. नीतीश कुमार को NDA का CM चेहरा घोषित किया गया है, लेकिन सर्वे के अनुसार उनकी घटती लोकप्रियता बीजेपी के लिए मौका हो सकती है. अगर जद(यू) की सीटें कम हुईं तो बीजेपी सरकार गठन में बड़ी भूमिका निभा सकती है. वहीं, सर्वे रिपोर्ट बताती है कि बिहार की जनता विकास, रोजगार और स्थिरता को प्राथमिकता दे रही है जो NDA के पक्ष में जा सकता है.
क्या कहती है जनता?
सर्वे में 48.9% लोगों ने NDA को समर्थन दिया, जबकि 35.8% ने महागठबंधन को चुना है. तेजस्वी यादव (38.3%) को नीतीश (35.6%) से ज्यादा CM के रूप में पसंद किया गया जो जद(यू) की कमजोरी को दर्शा रहा है. फिर भी NDA की एकजुटता और बीजेपी की रणनीति इसे मजबूत स्थिति में रखती है. बिहार का सियासी भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या नीतीश अपनी खोई जमीन वापस पा सकेंगे.