बिहार में नीतीश की स्कीम के आगे तेजस्वी के वादे फेल

बिहार की राजनीति हमेशा से ही गठबंधनों, वादों और योजनाओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है. 2025 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ का ऐलान कर एक बड़ा दांव खेला है. इस योजना के तहत हर परिवार की एक महिला को रोजगार शुरू करने के लिए पहली किस्त के रूप में 10,000 रुपये दिए जाएंगे और बाद में 2 लाख रुपये तक की अतिरिक्त सहायता मिलेगी. यह योजना न केवल महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का दावा करती है, बल्कि चुनावी माहौल में एनडीए के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है. विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव की ‘माई-बहिन मान योजना’ के तहत महिलाओं को हर महीने 2,500 रुपए का वादा नीतीश के इस कदम के आगे फीका पड़ता नजर आ रहा है. हालांकि विपक्ष नीतीश की इस रणनीति को तेजस्वी के वादे की नकल बता रहा है.
तेजस्वी यादव ने दिसंबर 2024 में दरभंगा में ‘माई-बहिन मान योजना’ की घोषणा की थी, जिसमें आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को हर महीने 2,500 रुपए देने का वादा किया गया. यह वादा बिहार की आधी आबादी को लुभाने का प्रयास था.

महिलाओं की ताकत का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि 2020 के चुनाव में महिलाओं का वोटिंग टर्नआउट 54.5% था और नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बन गई थी. तेजस्वी ने अपनी योजना को ‘समृद्ध महिला, सुखी परिवार’ के नारे के साथ जोड़ा है. रक्षाबंधन के मौके पर एक खुला पत्र लिख कर महिलाओं के लिए तेजस्वी ने 13 वादों का जिक्र किया था, जिसमें 2,500 रुपए मासिक सहायता, 500 रुपए में गैस सिलेंडर और 200 यूनिट मुफ्त बिजली शामिल थे. लेकिन ये वादे अभी कागजी ही हैं. इसके लिए कोई बजट प्रावधान कितना होगा या कार्यान्वयन की योजना तेजस्वी ने नहीं बताया है. नीतीश कुमार ने इस वादे को चुनौती के रूप में लिया और अगस्त 2025 में कैबिनेट बैठक में ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ को मंजूरी दी. 7 सितंबर 2025 को इसका शुभारंभ हुआ और 15 सितंबर से लाभार्थियों के खातों में 10,000 रुपए का ट्रांसफर शुरू हो जाएगा.

2.7 करोड़ महिलाओं को मिलेंगे 10 हजार

योजना जीविका समूहों से जुड़ी महिलाओं के लिए है, जहां पहले 10,000 रुपए दिए जाने हैं. 6 महीने बाद बिजनेस आकलन के आधार पर 2 लाख तक लोन-सहायता दी जाएगी. ग्रामीण विकास विभाग के माध्यम से 20,000 करोड़ का बजट आवंटित किया गया है, जो 2.7 करोड़ परिवारों को कवर करेगा. नीतीश ने इसे ‘महिला सशक्तीकरण का मिशन’ बताया है, जो 2005 से उनके शासन की निरंतरता की दिशा में उठाया गया कदम है. तेजस्वी ने इसे ‘नकलची योजना’ कहा, लेकिन नीतीश का फायदा यह है कि वे सिर्फ वादा नहीं कर रहे, बल्कि अमल कर दिखा भी रहे हैं. महिलाओं का 2020 में एनडीए की ओर झुकाव इसी अमल की वजह से था. शराबबंदी, जीविका और 35% आरक्षण जैसे कदमों से इसे समझा जा सकता है.

नीतीश के 10,000
तेजस्वी का 2,500 रुपये मासिक वादा आकर्षक लगता है. इसके तहत साल में 30,000 रुपए मिलेनंगे. जन सुराज के प्रणेता प्रशांत किशोर ने तेजस्वी की स्कीम को अव्यावहारिक बताया है. उनका कहना है कि 6 करोड़ महिलाओं को 2,500 रुपए देने से सालाना 1.5 लाख करोड़ का खर्च होगा, जबकि बिहार का बजट 2.4 लाख करोड़ है. तेजस्वी ने इसे ‘महागठबंधन का पैकेज’ कहा, लेकिन कोई फंडिंग प्लान नहीं है .इसके अलावा 2025 बजट सत्र में उन्होंने मुफ्त बिजली और पेंशन बढ़ोतरी की मांग की, लेकिन ये वादे चुनावी घोषणापत्र तक सीमित हैं.

नीतीश का 10,000 रुपए प्रारंभिक सहायता + 2 लाख तक का पैकेज रोजगार-केंद्रित है. योजना में 18 व्यवसाय विकल्प दिए गए हैं. जैसे फल-सब्जी दुकान, मोबाइल रिपेयरिंग, डेयरी उत्पाद. जीविका से जुड़ना अनिवार्य है, जो पहले से 1.2 करोड़ महिलाओं को सशक्त कर चुका है. यह वादा नहीं, बजट-समर्थित अमल है. तुलना करें तो नीतीश का मॉडल सस्टेनेबल लगता है. महिलाओं को एकमुश्त मदद से स्वरोजगार का अवसर मिलेगा, जबकि तेजस्वी का मासिक भत्ता निर्भरता बढ़ा सकता है. 2020 में नीतीश की योजनाओं ने महिलाओं को एनडीए की ओर खींचा था. यह 10,000 रुपए वाला कदम उसे और मजबूत करेगा. तेजस्वी का वादा फेल साबित हो रहा है, क्योंकि नीतीश ने इसे लागू कर ‘प्रूफ ऑफ डिलीवरी’ दे दिया.

ऐसी योजनाओं से मिलते रहे हैं चुनावी लाभ
बिहार में महिला-केंद्रित योजनाएं हमेशा वोट बैंक साबित हुई हैं. 2010 में नीतीश की जीत में 50% महिला आरक्षण और स्कूली बच्चियों के लिए साइकिल योजना ने महिलाओं को लुभाया. 2015 में शराबबंदी ने 2020 में 54.5% महिला वोटिंग सुनिश्चित की, जहां एनडीए को 37.25% वोट मिले. जीविका योजना ने 80 लाख महिलाओं को जोड़ा, जिसका लाभ जेडीयू को मिला. 2020 में महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा वोट दिए और उत्तर बिहार के 167 क्षेत्रों में उनका टर्नआउट निर्णायक रहा. नीतीश की नई योजना इसी सिलसिले को आगे बढ़ाती है. 125 यूनिट मुफ्त बिजली, आशा कार्यकर्ताओं का मानदेय दोगुना (7,000 रुपए और TRE-4 में 35% महिला आरक्षण- ये सब एनडीए के लिए वोट कंसोलिडेशन का हथियार हैं. एक सर्वे में 63% लोगों ने कहा कि मुफ्त बिजली से एनडीए को फायदा होगा. एक्सपर्ट का मानना है कि महिलाओं का 55%+ टर्नआउट एनडीए को 225 सीटों का लक्ष्य दिला सकता है.

बिहार में नीतीश ने सुधार ली है अपनी स्थिति
नीतीश कुमार की स्थिति 2022 के गठबंधन ब्रेकअप के बाद कमजोर हुई थी, लेकिन 2024 लोकसभा चुनावों में JDU ने 16 पर लड़ कर 12 सीटें जीतीं, जो महिलाओं पर उसकी पकड़ दर्शाता है. महिला योजनाओं ने उनकी छवि ‘महिला सशक्तिकरण के चैंपियन’ के रूप में बना दी है. नीतीश ने प्रगति यात्रा में 2 करोड़ महिलाओं तक पहुंच बनाई और 7% ब्याज पर जीविका लोन ने ग्रामीण महिलाओं को जोड़ा है. JDU ने ‘मिशन 225’ लांच किया है. इसके तहत हर विधानसभा क्षेत्र में नीतीश की 20 साल की उपलब्धियों का बुकलेट बांटा जा रहा है. 79% साक्षरता दर, 35% महिला आरक्षण जैसी राज्य की योजनाओं का जिक्र है. तेजस्वी की लोकप्रियता युवाओं में है, लेकिन नीतीश का फोकस महिलाओं पर है, जो 2020 में गेम चेंजर रहीं. प्रशांत किशोर ने भले JDU को 25 सीटों से कम पर सिमट जाने की बात कही है, लेकिन महिलाओं का नीतीश को मिलता रहा समर्थन उनके दावे पर भरोसा करने से रोकता है.

महागठबंधन के बढ़े कुनबे से मुसीबत
महागठबंधन में अब (झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और पशुपति कुमार पारस की RLJP(पारस) भी शामिल हो गए हैं. घटक दलों की संख्या 5 से बढ़ा कर 8 कर तेजस्वी जितने खुश हैं, उतनी ही मुश्किल सीट बंटवारे में हो रही है. कांग्रेस 70, CPI 24, VIP 50-60और CPI-ML 40 सीटें मांग रहे हैं. 2020 में RJD ने 144 सीटें लड़ीं, लेकिन अब 243 सीटों को 8 में बांटना टकराव पैदा कर रहा है. मुकेश सहनी की VIP उप-मुख्यमंत्री पद भी मांग रही है, जबकि तेजस्वी CM फेस हैं. यह कुनबा वोटों का नुकसान कर सकता है. पिछली बार कांग्रेस को 70 सीटें देने का दंश तेजस्वी अब भी झेल रहे हैं. तेजस्वी सीएम नहीं बन पाए तो इसकी बड़ी वजह कांग्रेस रही, जो 70 सीटें लेकर सिर्फ 19 ही जीत पाई.