छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ‘पत्नी की बार-बार आत्महत्या की धमकी देना मानसिक क्रूरता’

बालोद: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक जीवन के विवादों को लेकर एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी बार-बार सुसाइड करने की धमकी देती है तो इसे शख्स के प्रति मानसिक क्रूरता माना जाएगा. इस मामले में पत्नी अपने शख्स पर इस्लाम धर्म स्वीकार करने का दबाव डाल रही थी और जहर पीने या आत्मदाह करने की धमकी दे रही थी, हाईकोर्ट ने इन सभी बातों को गंभीरता से लेते हुए फैमिली कोर्ट मंजूर ने तलाक के आदेश को सही ठहराया है और पत्नी की याचिका खारिज कर दी है.

बालोद जिले का है मामला
यह मामला बालोद जिले के एक दंपत्ति का है, जिन्होंने मई 2018 में शादी की थी. शादी के कुछ समय बाद ही दोनों के बीच विवाद शुरू हो गए थे. शख्स ने 14 अक्टूबर 2019 को स्थानीय पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी कि उसकी पत्नी उसे लगातार डरा रही है.शख्स का आरोप था कि पत्नी बार-बार जहर पीने, चाकू से चोट पहुंचाने और शरीर पर केरोसिन डालकर आग लगाने की धमकी देती है, इस व्यवहार के कारण शख्स लगातार भय के साये में जी रहा था. जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की डिवीजन बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण अवलोकन किया था. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्रूरता का अर्थ केवल शारीरिक मारपीट नहीं है, बल्कि जिस व्यवहार से शख्स के मन में डर और लगातार तनाव उत्पन्न होता है, वह भी मानसिक क्रूरता ही है.

धर्म बदलने का भी देती थी दवाब

कोर्ट ने नोट किया कि पत्नी की सुसाइड की धमकियों और प्रयासों ने शख्स के लिए ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी कि उसे डर के मारे पत्नी को उसके माता-पिता के घर छोड़ना पड़ा था, ताकि वह कोई अप्रिय कदम न उठाए और शख्स झूठे केस में न फंसे. हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि पत्नी का ऐसा व्यवहार क्रूरता के कानूनी मानदंडों को पूरा करता है, जो तलाक का मजबूत कारण है. इस मामले में न केवल सुसाइड की धमकी, बल्कि धर्म परिवर्तन का गंभीर मुद्दा भी सामने आया था. कोर्ट के समक्ष समुदाय के प्रतिनिधि की गवाही का हवाला दिया गया था, जिसमें कहा गया था कि पत्नी और उसके परिवार वाले शख्स पर इस्लाम धर्म अपनाने का दबाव डाल रहे थे.

हालांकि, पत्नी ने इन आरोपों से इनकार किया था, लेकिन कोर्ट ने सबूतों को ध्यान में रखते हुए शख्स की दलीलों को स्वीकार किया. जांच में सामने आया कि दंपत्ति नवंबर 2019 से अलग रह रहे थे. शख्स और समाज के बुजुर्गों ने समझौते के प्रयास किए थे, लेकिन पत्नी वापस नहीं आई. कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पत्नी ने बिना किसी मान्य कारण के शख्स का त्याग किया था. पत्नी ने दावा किया था कि शख्स ने दहेज और घरेलू हिंसा के मामले के बाद तलाक मांगा है, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था. उल्लेखनीय है कि कोर्ट के आदेश के अनुसार वर्तमान में पत्नी को उसके और नाबालिग बेटे के भरण-पोषण के लिए मासिक 2,000 रुपये का भत्ता दिया जा रहा है.