रोहतक: रोहतक में बेटे की चाह में एक महिला ने 12 बार गर्भधारण किया। बीते 23 जनवरी को महिला ने 12वीं बार भी बेटे की चाह में बच्ची को जन्म दिया। महिला की गर्भावस्था हाई-रिस्क वाली थी जिसको लेकर डॉक्टरों ने चेताया था।
बेटे की चाह में बहुजमालपुर की सुदेश (42) ने 12 बार गर्भधारण किया। 23 जनवरी को फिर बेटी हो गई तो उन्हें समझ आई। बोलीं, अब और बच्चे नहीं करूंगी। वैसे, उन्हें एक बेटा हुआ था लेकिन बचा नहीं। कुल सात बेटियों में से वह दो की शादी कर चुकी हैं। एक के तो दो बच्चे भी हैं।
रोहतक शहर से 15 किमी दूर गांव बहुजमालपुर के श्रीभगवान से सुदेश की शादी 1998 में हुई थी। घर की माली हालत शुरू से ही खस्ताहाल थी। खुद मजदूरी करती हैं। पति मजदूरी के साथ-साथ ऑटो भी चलाते हैं। सुदेश बताती हैं कि परिवार की शुरू से ही एक बेटे की चाह थी। इसी कारण शादी के बाद 27 वर्षों में बच्चा पैदा करने वाली मशीन-सी हो गईं।
कुल 12 में से सात बच्चे ही जीवित हैं। उन्हें 2001 में पहली बेटी हुई तो घर में ही बहुतों के चेहरे उतर गए। मां ने उसका नाम निशा रखा। शायद इसी कामना में कि कभी घर में उम्मीदों का ”सूरज” भी पैदा होगा। शरीर इतनी सामर्थ्य वाला नहीं रहा तो भी वह गर्भधारण करती रहीं। फिलहाल, दो बेटियों निशा (25) और मनीषा (23) की शादी हो चुकी है। मनीषा को एक बेटा-बेटी भी हैं। स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण निशा मायके में ही रहती है।
तीन बेटियां काजल (12वीं), राधिका (11वीं) और प्रेरणा (7वीं में) पढ़ रही हैं। सात साल की प्रिया स्कूल नहीं जाती है। 23 जनवरी को आखिरी बेटी का जन्म पीजीआई में हुआ। कम हीमोग्लोबिन के बावजूद डॉक्टर उनकी नॉर्मल डिलीवरी कराने में सफल रहीं। सुदेश कहती हैं, अभी बेटी का नाम नहीं सोचा है। महिला एवं बाल विकास विभाग की सुपरवाइजर डॉ. नैंसी बताती हैं कि सुदेश को कई बार समझाया भी कि गर्भधारण से उनकी जिंदगी दांव पर लग सकती है। मगर, पति और परिवार की चाह के आगे वह चुप्पी साधे रहीं।
सुदेश की दास्तां बार-बार मां बनने तक सीमित नहीं है। उन्होंने बच्चों को खोने का दर्द भी झेला है। पति श्रीभगवान बताते हैं कि जन्म के बाद दो बेटियों की मौत हो गई। वर्ष 2020 में पैदा हुआ इकलौता बेटा भी कुछ ही घंटों में दुनिया छोड़ गया। दो बार गर्भपात भी कराना पड़ा।
बेटी सुदेश की दशा देख मां लक्ष्मी की आंखें भर आईं। वह कहती हैं, मेरी बेटी बस एक बेटे के लिए इतना दुख सहती रही। शरीर में ताकत नहीं थी, फिर भी बेटे की उम्मीद नहीं छोड़ी। एक बेटा हो जाता तो उसे लगता कि घर का रखवाला मिल गया।
पति श्रीभगवान कहते हैं कि मैं अपने पिता का अकेला बेटा हूं। चाहता था कि मेरा भी एक बेटा हो जाए। इससे उनका नाम चल सके। बेटियां तो शादी के बाद अपने घर चली जाती हैं।
सुदेश की गर्भावस्था हाई-रिस्क वाली थी। उन्हें प्रेगनेंट न होने की सलाह दी थी। परिवार नियोजन के फायदे भी बताए थे लेकिन बेटे की चाह में वह नहीं मानीं। शुक्र है, प्रसव हो गया। हालांकि, खतरा बहुत ज्यादा था। – राजेश, एएनएम बहूजमालपुर।
एक माह के अंदर जींद में बेटे की चाह वाले दो प्रकरण चर्चा में आ चुके हैं। इनमें उचाना खुर्द की रितु और फतेहाबाद जिले के गांव ढाणी भोजराज की सुनीता ने बेटे की चाह में 10-10 बेटियों को जन्म दिया। 11वीं बार बेटा होने पर ही उन्हें चैन आया। दोनों ने बेटों के नाम भी दिलखुश रखा। रितु की शादी 24 साल पहले सुरेंद्र से हुई थी। सुरेंद्र दिहाड़ी मजदूर हैं। संजय की पत्नी सुनीता को एक निजी अस्पताल में प्रसव से पहले खून तक चढ़ाना पड़ा था।