चंडीगढ: हरियाणा के गांवों में अब अप्रैल की तपती दोपहर में बिजली के दर्शन दुर्लभ हो सकते हैं। बिजली निगम ने एक बड़ा सुरक्षात्मक कदम उठाते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति के समय में व्यापक बदलाव करने का मन बना लिया है। यह फैसला किसी बिजली किल्लत की वजह से नहीं, बल्कि किसानों की साल भर की मेहनत यानी ‘सुनहरी गेहूं’ को आग की भेंट चढ़ने से बचाने के लिए लिया गया है। अप्रैल के पहले हफ्ते से ही प्रदेश के अधिकतर जिलों में दिन के समय बिजली गुल रहेगी।
क्यों जरूरी है दोपहर का ‘पावर कट’?
जैसे-जैसे अप्रैल का पारा चढ़ता है, हरियाणा के मैदानी इलाकों में गर्म और तेज हवाएं (लू) चलना शुरू हो जाती हैं। खेतों के ऊपर से गुजरने वाली हाई-टेंशन और लो-टेंशन लाइनें इन हवाओं के कारण आपस में टकराती हैं या फिर ढीले तारों से निकली चिंगारी सूखी खड़ी फसल में बारूद का काम करती है। पिछले सालों के आंकड़ों पर गौर करें तो शॉर्ट-सर्किट की एक छोटी सी चिंगारी ने देखते ही देखते सैकड़ों एकड़ फसल खाक कर दी थी। इसी ‘जोखिम’ को शून्य करने के लिए निगम ने अब दोपहर के वक्त लाइनों को डेड (Dead) रखने का फैसला किया है।
सुबह-शाम मिलेगी भरपूर सप्लाई, रोस्टर तैयार
बिजली निगम के अधिकारियों का कहना है कि ग्रामीणों और किसानों को परेशानी न हो, इसके लिए नया रोस्टर यानी समय सारिणी तैयार की जा रही है। दोपहर की कटौती की भरपाई सुबह जल्दी और शाम को देर तक बिजली देकर की जाएगी। इससे जहां पशुओं के चारे और पानी का इंतजाम प्रभावित नहीं होगा, वहीं ट्यूबवेल चलाने वाले किसानों को भी पर्याप्त समय मिल सकेगा। विभाग का मानना है कि सुबह और शाम को हवा की गति कम रहने से स्पार्किंग का खतरा न के बराबर होता है।
किसानों और पंचायतों ने किया फैसले का स्वागत
हैरानी की बात यह है कि आमतौर पर बिजली कटौती का विरोध करने वाले ग्रामीण इस बार सरकार के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। कई जिलों के सरपंचों का कहना है कि दो घंटे की बिजली से ज्यादा कीमती किसानों की खड़ी फसल है। बिजली निगम ने स्पष्ट किया है कि यह शेड्यूल तब तक जारी रहेगा जब तक कि खेतों से गेहूं की लावणी (कटाई) पूरी होकर अनाज मंडियों तक नहीं पहुंच जाता।