शिमला. हिमाचल प्रदेश में अवैध कब्जे पर बुलडोजर चलने वाला है. सुक्खू सरकार ने विधानसभा में जो दावा किया था, उसके विपरित अब अवैध कब्जाधारियों को नोटिस दिया गया है और दस दिन में अवैध कब्जे हटाने के आदेश दिए हैं. नोटिस मिलने के बाद अब अवैध कब्जे करने वाले लोगों में हड़कंप मचा हुआ है. गौरतलब है कि हाल ही में सुक्खू सरकार ने विधानसभा सत्र में कहा था कि वह 1.60 हजार अवैध कब्जाधारियों के हितों की रक्षा करेगी. अहम बात है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में भी विचाराधीन है.
जानकारी के अनुसार, सरकार के राजस्व विभाग की तरफ से वन भूमि के अलावा, सरकारी जमीन पर कब्जाधारियों को गुरुवार को नोटिस जारी किए. मंडी में एक कब्जाधारी ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि 2 दिसंबर को नोटिस जारी किया गया है और 10 दिन में कब्जा हटाने के निर्देश दिए गए हैं. नोटिस में साफ लिखा गया है कि सरकारी जमीन यदि खाली नहीं की गई तो फिर पुलिस और प्रशासन की तरफ से कब्जा हटाया जाएगा और फिर इसका खर्चा कब्जाधारी को वहन करना होगा. शिमला के रोहड़ू में भी वन भूमि पर कब्जा करने वाले लोगों को नोटिस जारी किया गया है.
शिमला में माकपा नेता संजय चौहान ने सोशल मीडिया पर सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए लिखा कि आखिर ये हिमाचल प्रदेश में सरकार चला कौन रहा है! इधर माननीय मुख्यमंत्री विधानसभा सत्र के दौरान सदन में ब्यान दे रहे हैं कि परिवारों को बेघर नहीं होने देंगे और हक की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेंगे और उसके बावजूद वन अधिकारी घरों व ज़मीन से बेदखली की कार्यवाही के लिए नोटिस जारी कर रहे हैं. सरकार में कोई है जो जवाब देगा, इसका प्रदेश की जनता को.
विधानसभा में क्या कहा था
हिमाचल प्रदेश के शीतकालीन सत्र में नेता प्रतिपक्ष जय राम ठाकुर, ने इस मामले पर सरकार से सवाल किया था और आरोप लगाया था कि सरकार 1.25 हजार लोगों के मुद्दे को लेकर गंभीर नहीं है. हालांकि, राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी सदन में कहा था कि हमारी सरकार सुप्रीम कोर्ट में 1 लाख 24 हजार 780 लोगों के हकों की लड़ाई लड़ रही है. सीएम सुक्खू ने भी सदन को आश्वासन दिया था कि लोगों के हितों की लड़ाई मजबूती से लड़ी जाएगी और 1 लाख 24 हजार नहीं, बल्कि 1 लाख 60 हजार लोगों के हित्तों की रक्षा की जाएगी. जगत सिंह नेगी ने यहां तक कहा था कि अगर लैंड रेवन्यू एक्ट की 163-धारा को सुप्रीम कोर्ट से फिर से मान्यता मिल भी जाती है तो उससे लाभ नहीं मिलेगा, क्योंकि सरकार के पास जमीन नहीं है. सारी वेस्ट लैंड फोरेस्ट लैंड है, अगर केंद्र सरकार एफसीए में संशोधन करेगी तो ही लोगों को राहत मिलेगी.
हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया कानून
गौरतलब है कि 5 अगस्त को हिमाचल हाईकोर्ट ने 23 साल पुरानी इस नीति को लेकर रद्द कर दिया था. हाईकोर्ट ने 28 फरवरी 2026 तक सरकारी भूमि से अवैध कब्जों को हटाने के आदेश जारी किए हैं. हालांकि, मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है और कोर्ट ने यथास्थित बनाए रखने के आदेश दिए हैं. अवैध कब्जों के नियमितीकरण नीति के तहत सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों लोगों से भाजपा सरकार ने आवेदन मांगे थे और इस दौरान एक लाख पैंसठ हजार लोगों ने अवैध कब्जों को नियमित करने का आवेदन किया था. बाद में 2002 में भाजपा सरकार ने भू-राजस्व अधिनियम में संशोधन कर धारा 163-ए जोड़ा था और लेकिन इसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है. इस धारा के तहत लोगों को पांच से 20 बीघा तक जमीन देने और नियमितीकरण करने का का प्रावधान किया गया था.