मध्यप्रदेश के इंदौर में दूषित पानी पीने से कई लोग अपनी जान गवां चुके हैं. अब पूरे प्रदेश पर एक बड़ी जल-त्रासदी का साया मंडरा रहा है, यहां भूजल भी अब दूषित होने लगा है. केंद्र सरकार की ताजा रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. रिपोर्ट के अनुसार, मध्यप्रदेश के 55 में से 39 जिलों का भूजल पीने लायक नहीं बचा है. इन जिलों के पानी में नाइट्रेट की मात्रा निर्धारित मानकों से कहीं ज्यादा पाई गई है.
दूसरे नंबर पर मध्यप्रदेश
अगस्त 2025 में जारी हुई भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2024 के अनुसार, नाइट्रेट प्रदूषण के मामले में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश के बाद देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है. रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के 70 प्रतिशत से ज्यादा जिलों में नाइट्रेट का स्तर 45 मिलीग्राम प्रति लीटर (mg/L) की सुरक्षित सीमा को पार कर चुका है.
ऑक्सीजन सोखता है यह धीमा जहर
विशेषज्ञों के अनुसार, पानी में नाइट्रेट की अधिकता एक साइलेंट किलर की तरह काम करती है. जब नाइट्रेट शरीर में पहुंचता है तो ब्लड की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता को कम कर देता है. इससे सबसे ज्यादा खतरा छोटे बच्चों को है. छोटे बच्चों के लिए यह जानलेवा हो सकता है, जिससे ब्लू बेबी सिंड्रोम जैसी बीमारियां होती हैं. वहीं वयस्कों में यह थकान, चक्कर आना और लंबे समय में अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनता है.
इन जिलों में भूजल में है ज्यादा मात्रा
जिन जिलों के भूजल में नाइट्रेट की मात्रा सामान्य से ज्यादा है, उनमें इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, रीवा, सागर, खंडवा, खरगोन, नीमच, मंदसौर, धार और गुना सहित कुल 39 जिले शामिल हैं. इन क्षेत्रों में रहने वाली बड़ी आबादी सीधे तौर पर बोरवेल और हैंडपंप के पानी पर निर्भर है, जो अब उनके स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन चुका है.
क्यों जहरीला हो रहा पानी
केंद्र सरकारी की रिपोर्ट में पानी में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ने के तीन मुख्य कारण बताए गए हैं.
शहरों में सीवेज निपटान की सही व्यवस्था न होना और सेप्टिक टैंकों से होने वाला रिसाव सीधे भूजल में मिल रहा है.
धान और गेहूं की फसलों में यूरिया और अन्य नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों का अत्यधिक इस्तेमाल मिट्टी से रिसकर पानी तक पहुंच रहा है.
कंक्रीट के बढ़ते जाल और जयवायु परिवर्तन के कारण जमीन के अंदर पानी का रिचार्ज कम हो गया है, जिससे नाइट्रेट की कंसन्ट्रेशन बढ़ती जा रही है.