ईरान तो बदनाम हुआ, होर्मुज पर नए टोल प्लान से असली लॉटरी तो ओमान की लगेगी! तेल फिर उबलेगा?

Strait of Hormuz: अमेरिका और ईरान युद्ध के बीच होर्मुज स्ट्रेट सबसे बड़ा डेडलॉक बना हुआ है. अमेरिका चाहता है कि वैश्विक व्यापार का अहम गलियारा बिना किसी रोक-टोक के खुला रहे. वहीं ईरान साफ कर चुका है कि वो किसी भी हालात में होर्मुज पर अपना अधिकार नहीं छोड़ने वाला है. जिस रास्ते से ग्लोबल ऑयल का 20 फीसदी हिस्सा गुजरता है, उस रास्ते पर नाकेबंदी कर ईरान ने ना केवल अमेरिका को घुटनों पर ला दिया, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई ठप कर दी. अब इसी रास्ते पर नया ट्रांजिट और टोल सिस्टम लागू कर ईरान होर्मुज पर अपना अधिकार और धाक जमाना चाहता है.

हालांकि ईरान का ये ट्रांजिट टोल प्लान बिना ओमान के पूरा होता नहीं दिख रहा है. सिंगापुर मलक्का मॉडल के बेस पर होर्मुज पर नया टोल सिस्टम लगाने की तैयारी की जा रही है, जहां समुद्री रास्ते का कंट्रोल क्षेत्रीय सहयोग से किया जाता है, किसी एक देश के नियंत्रण से नहीं.

बिना ओमान के होर्मुज पर नियंत्रण और टोल वसूली संभव नहीं
ईरान जानता है कि बिना ओमान के सहयोग के वो होर्मुज पर ट्रांजिट शुल्क नहीं वसूल पाएगा. होर्मुज में जहाजों पर होने वाले हमले के बाद से टैंकरों ने होर्मुज से किनारा करते हुए ओमान के समुद्री रास्ते का विकल्प चुन लिया था. ऐसे में ईरान का दावा है कि नई ट्रांजिट व्यवस्था ने होर्मुज से जहाजों की आवाजाही ना केवल सुरक्षित और आसान होगी,बल्कि इस शुल्क की वजह से क्षेत्रीय देशों के बीच बेहतर संबंध स्थापित होंगे. ईरान के प्लान पर ओमान ने भी दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया है. ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल बुसैदी ने ईरान के ईरान के होर्मुज पर ‘मेरिटाइम सर्विस फीस’ वसूलने की योजना की तारीफ की है.

होर्मुज पर नया ट्रांजिट सिस्टम क्यों लागू करना चाहता है ईरान?
होर्मुज पर नई ट्रांजिट व्यवस्था लागू कर सिर्फ जहाजों की आवाजाही को कंट्रोल नहीं करना चाहता, बल्कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण रास्ते पर वो रणनीतिक मजबूती स्थापित करना चाहता है. ओमान के साथ मिलकर वो होर्मुज पर नई ट्रांजिट व्यवस्था के जरिए ईरान की भूमिका को औपचारिक मान्यता दिलाना चाहता है. इसके पीछे ईरान के तीन फायदे छिपे हैं…

पहला: वो दुनिया को ये दिखा चुका है कि वो ग्लोबल सप्लाई चेन को रोकने की ताकत रखता है, अब ट्रांजिट सिस्टम के जरिए वो इसे ऑफिशियल करना चाहता है.

दूसरा: टोल सिस्टम के जरिए ईरान को भारी राजस्व हासिल होगा, जो युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को ताकत देगा. ट्रांजिट शुल्क के बदले जहाजों की सुरक्षित आवाजाही, ट्रैफिक मैनेजमेंट, रूट मेंटिनेंस जैसी सर्विस देंगे. ईरान अपने इस ट्रांजिट सर्विस को सिंगापुर–मलक्का जलडमरूमध्य जैसे क्षेत्रीय सहयोग मॉडल से कंप्येर कर रहा है.

तीसरा: ईरान होर्मुज के भौगोलिक स्थिति को अपनी राजनीतिक और आर्थिक ताकत में बदलने की कोशिश कर रहा है. इसके लिए वो ओमान को अपने पाले में लाकर इसे क्षेत्रिय सहयोग मॉडल के तौर पर पेश करना चाहता है, हालांकि ये सब इतना आसान नहीं है. अंतरराष्ट्रीय ट्रेड मार्ग पर टोल शुल्क लगाना अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है. अमेरिका समेत पश्चिमी देश इसी का हवाला देकर ईरान को रोकने की कोशिश कर रहे हैं.

ईरान दावा कर रहा है कि होर्मुज पर इसका ट्रांजिट मॉडल ‘ मलक्‍का स्‍ट्रेट मॉडल’ की तरह है. दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक मलक्‍का स्‍ट्रेट हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ता है. ग्लोबल ट्रेड का लगभग 30-40% हिस्सा इसी संकरे रास्ते से गुजरता है.इस रास्ते का कंट्रोल संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून (UNCLOS) के तहत होता है, जिसे सिंगापुर, मलेशिया और इंडोनेशिया मिलकर संभालते हैं.यहां गौर करने वाली बात है कि मलक्का स्ट्रेट में जहाजों से अनिवार्य टोल नहीं लिया जाता, बल्कि शिपिंग कंपनियां अपनी स्वेच्छा से करती हैं.

होर्मुज पर इस मॉडल का लागू होना आसान नहीं है. होर्मुज स्ट्रेट में ईरान और ओमान के अलावा खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देश, अमेरिका और अन्य नौसैनिक शक्तियों के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है. ओमान के साथ भी ईरान के संबंध मधुर नहीं है. ऐसे में एकमत से व्यवस्था लागू कर पाना आसान नहीं है. यदि ईरान इस गलियारे पर अनिवार्य ट्रांजिट शुल्क लगाता है या जहाजों के ट्रांजिट को रोकता है, तो फिर अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत ये कानूनी विवाद का विषय बन सकता है.

ईरान के प्लान से तेल कीमत, शिपिंग, अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर क्या असर पड़ सकता है?
U.S. Energy Information Administration के मुताबिक होर्मुज के रास्ते से हर दिन करीब 20 मिलियन बैरल कच्चे तेल ता ट्रांसपोर्टेशन होता है. ग्लोबल पेट्रोलियम के खुल खपत का करीब 20 फीसदी इसी रास्ते से होकर गुजरता है. LNG, LPG के आयात-निर्यात के लिए ये रास्ता बेहद अहम है. कतर जैसे खाड़ी देशों के लिए तो लाइफलाइन की तरह है. अगर इस रास्ते पर ट्रांजिट शुल्क लगाया गया, तो ग्लोबल ऑयल प्राइस पर असर होगा. कच्चे तेल की कीमत बढ़ेगी. सप्लाई चेन जारी रहने के बाद भी त

ईरान ने होर्मुज पर टोल शुल्क लगाया तो भारत पर क्या असर होगा?
होर्मुज पर किसी भी तरह की ट्रांजिट की कोशिश सिर्फ ग्लोबल ऑयल मार्केट में खलबली नहीं लाएगी, बल्कि दुनियाभर के देशों और ग्लोबल शिपिंग कंपनियों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ेगा. खासकर गल्फ देशों के लिए तबाही और अधिक होगी, क्योंकि उनके पास होर्मुज का वैकल्पिक रास्ता मौजूद नहीं है. सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कुवैत, कतर और बहरीन जैसे खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सदस्य देश तेल और गैस निर्यात के लिए हॉर्मुज पर निर्भर है. भारत के लिए भी मुश्किल बढ़ेगी, क्योंकि कच्चे तेल और LNG की बड़ी खेप वो इसी रास्ते से आयात करता है. होर्मुज में किसी भी तरह की अस्थिरता, प्रतिबंध भारत के ऊर्जा आयात पर असर डालेगा. अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) और इंटरनेशनल चैंबर ऑफ शिपिंग (ICS) ने होर्मुज पर ईरान की नाकेबंदी का लगातार विरोध किया है.

होर्मुज को छोड़ अगर ओमान के रास्ते से गुजरे जहाज, तो क्या असर होगा ?
अगर ईरान अपनी जिद से पीछे नहीं हटता है और होर्मुज पर नाकेबंदी जारी रखता है, तो जहाज ओमान के समुद्री रास्ते का इस्तेमाल कर सकते हैं. अगर ऐसा होता है, तो इसका असर सिर्फ होर्मुज की अहमियत ,वैश्विक व्यापार तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की आर्थिक और भू-राजनीतिक तस्वीर बदल सकती है. ओमान का दबदबा खाड़ी देशों के बीच बढ़ेगा, वैश्विक तौर पर उसकी रणनीतिक अहमियत बढ़ेगी. ओमान अपने पोर्ट और लॉजिस्टिक नेटवर्क की बदौलत दुनिया का प्रमुख व्यापार केंद्र बन सकता है. ओमान में निवेश के रास्ते खुल जाएंगे. ओमान बीते कई सालों से तेल पर अपनी निर्भरता को कम करने की कोशिशों में जुटा है. ओमान विज़न 2040 (Oman Vision 2040) के तहत वो पोर्ट ऑफ डुक्म (Port of Duqm), पोर्ट ऑफ सोहार (Port of Sohar) और पोर्ट ऑफ सलालाह (Port of Salalah) जैसे आधुनिक बंदरगाहों को विकसित कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (UNCTAD) के मुताबिक अगर जहाजों का रूट होर्मुज से बंटकर ओमान की ओर जाते हैं, तो वैश्विक व्यापार की एक रास्ते पर निर्भरता खत्म हो जाएगी.

फिर भी हॉर्मुज की अहमियत कायम रहेगी
ओमान के रास्ते से जहाजों के गुजरने के बाद भी होर्मुज की की रणनीतिक अहमियत कम नहीं होगी. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के अनुसार, पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए भी होर्मुज का विकल्प खोजने की कोशिश हुई, लेकिन वह भी होर्मुज को पूरी तरह से रिप्लेस नहीं कर पाया. भले ही कुछ जहाज ओमान का रुख कर लें, लेकिन ग्लोबल एनर्जी सप्लाई में होर्मुज की जरूरत और उसका महत्व कम नहीं होगा