काठमांडू: नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली कहां हैं? ये वो सवाल है जो नेपाल में हर कोई पूछ रहा है. गुस्साए प्रदर्शकारियों ने उनके घर और संसद को आग के हवाले कर दिया. इसके बाद उन्होंने आखिर इस्तीफा दे दिया. एपी की एक रिपोर्ट के अनुसार, ओली का इस्तीफा देश के राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल ने स्वीकार कर लिया है, और कथित तौर पर उन्हें तब तक कार्यवाहक सरकार का नेतृत्व करने का काम भी सौंपा है. इस बीच एक खबर आई है कि उन्होंने तख्तापलट के बाद पहली बार ओपन लेटर लिखर Gen-Z को संबोधित किया है. इस इमोशनल लेटर में उन्होंने कथित तौर पर उन्होंने अपनी लोकेशन का भी जिक्र किया है. न्यूज-18 इंडिया स्वतंत्र रूप से इस पत्र की पुष्टि नहीं करता है.
पत्र में क्या लिखा?
पत्र में भी उन्होंने भारत से सीमा विवाद के मुद्दे का जिक्र किया. उन्होंने लिखा, ‘लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा नेपाल के और अगर इस मुद्दे को न उठाया हो तो मुझे कई फायदे मिलते.’ पत्र में उन्होंने लिखा, ‘आज, शिवपुरी में नेपाल सेना के सैनिकों से घिरे एक सुरक्षित और अलग क्षेत्र में बैठकर, मैं आप सभी को याद कर रहा हूं. आपके चेहरे मेरे दिमाग में जीवंत रूप से नाच रहे हैं. जहां भी मैं जाता हूँ, छोटे बच्चों को देखता हूं, वे तुरंत मेरी बांहों में दौड़ आते हैं. उनकी मासूम हंसी, उनके छोटे-छोटे शरीर की गर्माहट, मुझे अपार खुशी से भर देती है. बच्चों के बीच रहना हमेशा मुझे उत्साह और संतुष्टि देता रहा है.’
‘मैं पिता नहीं बन पाया’
ओली ने अपने पिता न बन पाने के दर्द को भी साझा किया. उन्होंने लिखा, ‘शायद आप नहीं जानते, जब देश में शासन परिवर्तन की कठिन लड़ाइयां चल रही थीं, उस समय सरकार की ओर से किए गए निर्दय अत्याचारों के कारण मैं अपने बच्चों का पिता नहीं बन सका. फिर भी पिता बनने की इच्छा मेरे भीतर कभी नहीं मरी. जब मुझे पता चला कि पुलिस की गोलियों ने मेरे बेटों और बेटियों की जान ले ली, उसी दिन मेरी जिंदगी के कई हिस्से खत्म हो गए. उस दर्द के घाव आज भी ताजे हैं. फिर भी, मैंने हमेशा विश्वास किया कि समाज में शांति बनी रहनी चाहिए. आप याद कर सकते हैं, जब मैं 1994 में गृह मंत्री था, मेरे कार्यकाल में एक भी गोली नहीं चलाई गई. मैंने हमेशा शांति का पक्ष लिया, क्योंकि मैंने खुद हिंसा की क्रूरता झेली है.’
‘बच्चों ने नहीं की हिंसा’
नेपाल में हुए प्रदर्शन के दौरान भारी हिंसा देखी गई है, जिसे लेकर ओली ने कहा कि वो नहीं मानते कि बच्चों ने ये हिंसा की है. उन्होंने लिखा, ‘आंदोलन के दूसरे दिन, चाहे वह कितना भी विनाशकारी क्यों न हो गया हो, मुझे पूरा विश्वास है कि ये कार्य आपके नाजुक हाथों से नहीं हुए. आपके मासूम चेहरे दिखाकर, आपके भावनाओं के साथ गंदी राजनीति करने की कोशिश की जा रही है. महत्वपूर्ण रिकॉर्ड ऑफिसों में आग लगाना, जेलों से कैदियों को छोड़ना, ये घटनाएं संयोग नहीं हैं. इनके पीछे गहरी साजिशें हैं. यह वही व्यवस्था है, जिसे हमने अनगिनत कष्ट और बलिदानों के माध्यम से लाया है, और अब उस पर हमला किया जा रहा है. उस समय, हमारे पास बोलने का, इकट्ठा होने का, सवाल पूछने का अधिकार नहीं था.’
बॉर्डर और भगवान राम पर फिर छेड़ा विवाद
अपने पत्र में उन्होंने बताया कि वह बेहद जिद्दी हैं. उन्होंने लिखा, ‘प्रकृति से मैं थोड़ा जिद्दी हूं. अगर यह जिद नहीं होती, तो मैं कठिनाइयों में बहुत पहले ही हार मान लेता. इसी जिद की वजह से मैंने सोशल मीडिया कंपनियों से कहा कि वे नेपाल के नियमों का पालन करें और यहाँ रजिस्टर हों. इसी जिद की वजह से मैंने घोषणा की कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा नेपाल के हैं. इसी जिद की वजह से मैंने शास्त्रों में बताए अनुसार कहा कि भगवान राम का जन्म भारत में नहीं बल्कि नेपाल में हुआ था. यदि मैं इन मतों से पीछे हट जाता, तो मुझे कई लाभ और अवसर मिल सकते थे. यदि मैंने लिम्पियाधुरा सहित नेपाल का संशोधित नक्शा संयुक्त राष्ट्र को नहीं भेजा होता, या किसी और को मुझे निर्देश देने दिया होता, तो मेरी जिंदगी का रास्ता अलग होता. लेकिन मैंने राज्य को अपनी सारी ताकत दे दी. मेरे लिए पद और प्रतिष्ठा कभी मायने नहीं रखते.’ उन्होंने आगे कहा, ‘चाहे मैं पद पर रहूं या नहीं, इससे मुझे कभी फर्क नहीं पड़ा. सबसे महत्वपूर्ण है इस व्यवस्था की रक्षा करना.’
बता दें कि केपी ओली लगातार बॉर्डर को लेकर भारत से विवाद करते रहे हैं. वहीं 2020 में उन्होंने एक बयान में कह दिया कि भगवान राम नेपाल से थे. इसका भारत समेत नेपाल में विरोध हुआ था. उन्होंने नया नक्शा जारी किया, जिसका भारत ने खुला विरोध किया था.