जयपुर: राजस्थान के श्रम बाजार को लेकर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की ओर से जारी वर्ष 2025 (जनवरी-दिसंबर) के लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट के आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान की वर्कफोर्स में पुरुषों और महिलाओं के बीच एक गहरी खाई नजर आ रही है। जहां गांव की महिलाएं खेती और पशुपालन के जरिए अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान दे रही हैं, वहीं शहरी इलाकों में कामकाजी महिलाओं का आंकड़ा बेहद निराशाजनक है।
राजस्थान का कुल लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट 45.4%
आंकड़ों की बात करें तो राजस्थान का कुल लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट 45.4% है, जो राष्ट्रीय औसत (42.2%) से थोड़ा बेहतर है। लेकिन जब हम गहराई में जाते हैं, तो जेंडर गैप साफ दिखाई देता है। प्रदेश में पुरुषों की भागीदारी जहां 55.3% है, वहीं महिलाओं की भागीदारी मात्र 35.5% पर टिकी है।
गांवों की ‘शक्ति’ और शहरों की ‘सुस्ती’
रिपोर्ट में सबसे दिलचस्प पहलू ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों का अंतर है-
ग्रामीण राजस्थान: यहां LFPR 47.5% है। गांवों में पुरुष भागीदारी 54.9% है, जबकि महिलाओं की भागीदारी 40.3% है। नागौर, बाड़मेर और बीकानेर जैसे जिलों में महिलाएं खेती, मवेशियों की देखभाल और घरेलू उद्योगों में घंटों पसीना बहाती हैं। हालांकि, इसे ‘अदृश्य मेहनत’ कहा जाता है क्योंकि पारिवारिक काम होने के कारण इसे अक्सर आधिकारिक तौर पर रोजगार नहीं माना जाता, फिर भी आंकड़ों में यह गांवों की साख बचा रहा है।
शहरी राजस्थान: शहरों की तस्वीर चिंताजनक है। यहां कुल भागीदारी घटकर 40% रह जाती है। शहरी पुरुषों की भागीदारी तो 56.4% है, लेकिन महिलाओं की भागीदारी गिरकर महज 22.2% रह गई है।
क्यों घर से बाहर नहीं निकल पा रही शहरी महिलाएं?
शिक्षा का स्तर बढ़ने के बावजूद शहरी क्षेत्रों में महिलाओं का वर्कफोर्स से दूरी बनाना कई सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों ने इसके पीछे कुछ ठोस कारण बताए हैं।
सामाजिक मानदंड और ‘सुरक्षित’ नौकरी: जयपुर और अजमेर जैसे शहरों में आज भी मध्यमवर्गीय परिवारों में महिलाओं के लिए केवल ‘टीचिंग’ या ‘सरकारी दफ्तर’ की नौकरी को ही सुरक्षित माना जाता है। देर रात तक काम या यात्रा वाली नौकरियों को हतोत्साहित किया जाता है।
सरकारी परीक्षाओं का मोहपाश: कोटा और सीकर जैसे शिक्षा केंद्रों में हजारों युवतियां वर्षों तक सरकारी भर्तियों की तैयारी में लगी रहती हैं। इस दौरान वे किसी अन्य निजी क्षेत्र में काम नहीं करतीं, जिससे वर्कफोर्स में उनकी एंट्री में भारी देरी होती है।
सुरक्षा और परिवहन: छोटे शहरों में भरोसेमंद ट्रांसपोर्टेशन की कमी और सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी महिलाओं को नौकरी चुनने से रोकती हैं।
लचीलेपन का अभाव: कार्यस्थलों पर फ्लेक्सिबल वर्किंग ऑवर्स की कमी के कारण शादी के बाद कई महिलाएं करियर छोड़ देती हैं।
जेंडर गैप अभी भी एक बड़ी चुनौती
राजस्थान की स्थिति राष्ट्रीय स्तर (ग्रामीण 28.9% और शहरी 20.7% महिला भागीदारी) से थोड़ी बेहतर जरूर है, लेकिन जेंडर गैप अभी भी एक बड़ी चुनौती है। जब तक महिलाओं के ‘अवैतनिक श्रम’ को पहचान नहीं मिलेगी और शहरों में उनके लिए कार्यस्थल सुगम नहीं होंगे, तब तक प्रदेश की आधी आबादी का आर्थिक योगदान आंकड़ों में सिमटा रहेगा।