देहरादून। उत्तराखंड में चौमासे (वर्षाकाल) की दस्तक के साथ ही पहाड़ों में आपदा का खाैफ फिर से गहराने लगा है। जैसे ही आसमान में बादल घुमड़ते हैं, वैसे ही आपदा की दृष्टि से संवेदनशील 400 से अधिक गांवों के ग्रामीणों की सांसें अटक जाती हैं। बुजुर्ग सूनी आंखों से पहाड़ की दरकती चोटियों को निहारने लगते हैं। इन गांवों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए वर्षा की बूंदें भय का सबब बन गई हैं।
यद्यपि, आपदा प्रभावितों के विस्थापन की दिशा में कदम बढ़ा रही है, लेकिन इसकी रफ्तार बढ़ाने की दरकार है। यही नहीं, प्रभावितों के अन्यत्र विस्थापन में गांवों की संस्कृति, जीवंत समाज, सदियों पुरानी थाती और आजीविका के छूटने की भी बड़ी चिंता समाहित है, जिसे लेकर लोग सशंकित रहते हैं। ऐसे में इस पहलू पर भी गौर करना समय की जरूरत है।
14 साल में 236 गांवों के 2603 परिवारों का विस्थापन
सरकारी आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो वर्ष 2012 से 31 मार्च 2026 तक की अवधि में आपदा प्रभावित 236 गांवों के 2603 परिवारों का अन्यत्र स्थानों पर विस्थापन किया जा चुका है। इसके साथ ही 31 अन्य गांवों के 298 परिवारों की सुध लेते हुए सरकार ने इनके विस्थापन को 25 करोड़ की धनराशि भी संबंधित जिलों को जारी की है।
साफ है कि विस्थापन की रफ्तार कुछ धीमी है। यद्यपि, इस राह में भूमि और बजट की उपलब्धता कम बड़ी चुनौती नहीं है। इसके साथ ही राज्य में जिस तरह से आपदाएं आ रही हैं, उससे संवेदनशील गांवों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। अभी तक यह आंकड़ा 400 के पार पहुंच चुका है और आने वाले दिनों में इनकी संख्या बढ़ने से इन्कार नहीं किया जा सकता। ऐसे में विस्थापन की चुनौती और बढ़ना भी तय है।
टूटती आजीविका, छूटती संस्कृति की दोहरी मार
दरअसल, विस्थापन केवल घर या स्थान बदलने का नाम नहीं है, बल्कि यह विस्थापित होने वाले गांवों की सदियों पुरानी संस्कृति और आजीविका की जड़ों के उखड़ने जैसा भी है। पहाड़ों में आजीविका का मुख्य साधन कृषि, पशुपालन है। यही नहीं, हर गांव के अपने कुल देवता, पारंपरिक रीति-रिवाज, जात्राएं व लोक पर्व होते हैं, जो उस भूमि विशेष और प्रकृति से गहरे जुड़े हैं।
आपदा प्रभावितों के अलग-अलग क्षेत्रों में विस्थापन से ग्रामीणों को अपनी आजीविका, सांस्कृतिक धरोहर व सामाजिक ताने-बाने के बिखरने की चिंता रहती है। जानकारों का कहना है कि आपदा प्रभावितों के विस्थापन की नीति में ग्रामीणों की आजीविका की दीर्घकालिक सुरक्षा और उनके सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को अक्षुण्ण रखने के प्रविधानों को भी शामिल करना होगा।