हिमाचल में अब बारिश में नहीं बहेंगी सड़कें, सुक्खू सरकार करने जा रही ये काम

शिमला: हिमाचल में बरसात के मौसम में बार-बार सड़कों के टूटने और धंसने की समस्या अब इतिहास बनने जा रही है. पहाड़ों में भारी वर्षा के दौरान जल निकासी की कमी से सड़कें क्षतिग्रस्त होती रही हैं, लेकिन अब राज्य सरकार ने एक नई ड्रेनेज पॉलिसी को मंजूरी देकर इस चुनौती का स्थायी समाधान तलाशने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. नई ड्रेनेज पॉलिसी के तहत आधुनिक तकनीक, बेहतर डिजाइन और पहाड़ी भू-भाग के अनुरूप निर्माण मानकों को प्राथमिकता दी जाएगी. इससे यातायात सुगम होगा, पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और आम लोगों को सुरक्षित सफर का भरोसा मिलेगा.

प्रदेश सरकार के प्रवक्ता ने बताया कि पहाड़ी भौगोलिक स्थितियों के दृष्टिगत हिमाचल प्रदेश में सड़कें जीवन रेखा का काम करती है. दूर-दराज के गांवों से लेकर जिला मुख्यालयों तक राज्य में सड़कें आवागमन, व्यापार, पर्यटन और आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करने में मुख्य भूमिका निभा रही हैं. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के मार्गदर्शन में राज्य सरकार ने एक ‘रोड ड्रेनेज पॉलिसी’ तैयार की है.

40 हजार किलोमीटर सड़कों का जाल

राज्य सरकार के प्रवक्ता ने बताया कि यह नीति मानसून में होने वाली भारी बारिश के कारण होने वाले सड़कों के नुकसान को कम करने में प्रभावी साबित होगी. प्रदेश में लोक निर्माण विभाग 40 हजार किलोमीटर से अधिक सड़क नेटवर्क का रख-रखाव सुनिश्चित कर रहा है. इनमें जिला की मुख्य सड़कें, संपर्क मार्ग और ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कें शामिल हैं. क्षेत्रीय निरीक्षण और मानसून के बाद के आकलन से यह यह बात सामने आयी है कि अपर्याप्त जल निकासी व्यवस्था के कारण सड़कों को भारी क्षति पहुंचती है.

राज्य में वर्ष 2023 और 2025 में सड़कों को 2400 करोड़ और 3000 करोड़ रुपये का अनुमानित नुकसान हुआ था. तकनीकी मूल्यांकन से यह भी स्पष्ट हुआ कि अपर्याप्त ड्रेनेज सिस्टम और भूस्खलन के कारण ही सड़कों को अधिकांश नुकसान हुआ है. मानसून से सड़कों को होने वाली क्षति की मरम्मत पर हर वर्ष भारी खर्च होता है.

उन्होंने बताया कि पुरानी जल निकासी व्यवस्था में सुधार करते हुए नई ड्रेनेज नीति में वैज्ञानिक हाइड्रोलॉजिकल या भू-आधारित डिजाइन सिद्धांतों को अपनाया गया है. इस नीति में हाइड्रोलॉजी आधारित डिजाइन को केंद्र में रखा गया है. अब ड्रेनेज संरचनाएं वास्तविक वर्षा तीव्रता और जलग्रहण क्षेत्र की विशेषताओं जैसे वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर डिजाइन की जाएंगी.

यह डेटा एवं विश्लेषण आधारित नीति मानसून से होने वाली वार्षिक क्षति को कम करने, सड़क नेटवर्क के लचीलेपन को बढ़ाने और सार्वजनिक सुरक्षा व उपयोगिता को सुदृढ़ करने में सहायक होगा.

अब ये होगी नई व्यवस्था

राज्य सरकार के प्रवक्ता ने बताया कि सभी नई सड़क परियोजनाओं में बॉक्स कल्वर्ट को डिफॉल्ट ड्रेनेज संरचना के रूप में अपनाया जाएगा. इसमें जलभराव के कारण जाम होने की संभावना कम होती है और इन्हें मशीनों से साफ करना आसान होता है. नीति में पहाड़ी ढलानों की मजबूती पर भी विशेष बल दिया गया है और भूस्खलन संभावित तथा रिसाव क्षेत्रों में निवारण उपाय अनिवार्य किए गए हैं. सड़क अधोसंरचना में ड्रेनेज प्रणाली को मुख्य इंजीनियरिंग घटक के रूप में शामिल किया जाएगा.

उन्होंने कहा कि इस नीति में आबादी वाले क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं. खुले हिस्सों में ऊंचे कर्ब और इनलेट ओपनिंग बनाई जाएंगी। ताकि जल प्रवाह सुचारू रहे और यातायात सुरक्षित रहे. रात के समय दृश्यता और सड़क सुरक्षा बढ़ाने के लिए उचित अंतराल पर रिफ्लेक्टर भी लगाए जाएंगे.

उन्होंने बताया कि नीति का कार्यान्वयन चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा, जिसमें आर्थिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में हर मौसम में संपर्क सुविधा सुनिश्चित करने के लिए जिलों की मुख्य सड़कों को प्राथमिकता दी जाएगीं.

यह नीति हिमाचल में मानसून से होने वाली सड़कों की क्षति को कम करने के लिए एक दीर्घकालिक संरचनात्मक समाधान है. वैज्ञानिक योजनाएं, मजबूत इंजीनियरिंग मानकों, ढलान सुरक्षा उपायों और सख्त प्रवर्तन तंत्र के माध्यम से राज्य एक सुरक्षित, अधिक लचीले और टिकाऊ सड़क नेटवर्क विकसित करने की दिशा में अग्रसर है.