UP Chunav 2027 SP Split Claims: उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यानाथ सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारत समाज पार्टी (SBSP) के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर ने दावा किया है कि ममता बनर्जी की TMC और उद्धव ठाकरे की शिवसेना के बाद अगला नंबर अखिलेश यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी का है, जहां बड़ी फूट पड़ने वाली है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में दावा किया और आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और अखिलेश यादव के चाचा राम गोपाल यादव ने हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक चिट्ठी सौंपी है और संकेत दिया है कि पार्टी का एक हिस्सा भाजपा में जाने को तैयार है। बहरहाल, न तो सपा की तरफ से और न ही भाजपा की तरफ से इस पर कोई स्पष्टीकरण आया है।
बड़ी बात यह है कि राजभर ने इस टूट की वजह सपा के अंदर उस बेचैनी को बताया है जिसकी जड़ें माइनिंग स्कैम और गोमती रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट से जुड़ी पुरानी जांचों से जुड़ी हैं। उन्होंने X पर पोस्ट किया, “समाजवादी पार्टी में बड़ी टूट होगी। राम गोपाल यादव ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह जी को चिट्ठी सौंपी है। खनन घोटाला और गोमती रिवर फ्रंट घोटाला का मास्टरमाइंड कौन है, पूरा उत्तर प्रदेश जानता है। शिकंजा कस रहा है तो सपा परेशान है। महाराष्ट्र बंगाल छोड़िए, समूची सपा, भाजपा में शामिल होने को तैयार बैठी है।”
ध्यान सिर्फ महाराष्ट्र पर मत रखिए
इसके बाद उन्होंने ANI से बात करते हुए कहा, “अपना ध्यान सिर्फ़ महाराष्ट्र पर मत रखिए; अब UP की बारी है। क्या आपने नहीं देखा कि राम गोपाल जी ने अमित शाह जी को पत्र देकर कहा है कि ये नाम हैं, इन्हें बुलाइए और अपने साथ ले जाइए, लेकिन हमें सुरक्षित रखिए?” ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वाकई सपा में भी कोई बागी गुट है और क्या पार्टी के अंदर ऐसी कोई टूट की संभावना नजर आ रही है?
सपा में कोई टूट की आशंका है?
उत्तर प्रदेश की राजनीति के जानकारों और विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा समय में राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी में तृणमूल कांग्रेस या शिवसेना (UBT) जैसी टूट की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है। हालांकि, जानकारों ने हालिया कुछ अंदरूनी दबावों की ओर इशारा जरूर किया है। उनका मानना है कि 2027 के चुनाव से पहले टिकट वितरण को लेकर कुछ नेताओं में असंतोष जरूर पैदा हो सकता है, जो पार्टी और अखिलेश के मंसूबों को कमतर कर सकता है। जानकारों ने इसकी कड़ी पिछले राज्यसभा चुनाव से भी जोड़ा, जिसमें क्रॉस वोटिंग की बात सामने आई थी।
PDA और पारंपरिक वोट पर भी असर
चूंकि सपा अभी भी काफी हद तक यादव परिवार के नेतृत्व पर निर्भर है। इसलिए, जानकारों का मानना है कि अगर सपा में किसी तरह की टूट या खटपट होती है तो उससे पार्टी के पारंपरिक (यादव और मुस्लिम)वोट बैंक और अखिलेश के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) सामाजिक गठबंधन के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर इस समीकरण को साधने की कोशिश में पार्टी का कोई दमदार ओबीसी चेहरा टूटता है तो पार्टी पर उसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है।
2024 में अखिलेश ने दिखाया था दम
हालांकि, 20204 के लोकसभा चुनावों से पहले सपा के एक बड़े ओबीसी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने पार्टी छोड़ दी थी और अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बना ली थी, बावजूद इसके उत्तर प्रदेश में सपा ने लोकसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन किया था। पार्टी ने राज्य की 80 में से 37 संसदीय सीटें जीतीं और सहयोगी दलों ने 6 सीटें जीतीं। यानी इंडिया गठबंधन ने भाजपा की अगुवाई वाले NDA से ज्यादा कुल 43 सीटें जीतीं, जबकि NDA ने 36 सीटें जीतीं थीं। इस वापसी ने अखिलेश यादव को एक क्षेत्रीय विपक्षी नेता से INDIA गठबंधन के सबसे अहम चेहरों में से एक बना दिया। इससे पहले 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी सपा ने राज्य की 403 सीटों में से 111 सीटें जीतीं और एक मज़बूत विपक्षी ताकत के तौर पर उभरी।
अगर सपा के सांसद और विधायक टूटे तो क्या असर?
वैसे सपा में टूट की कोई संभावना तो फिलहाल नहीं दिख रही लेकिन राजभर के दावों ने एक चिंगारी जरूर जला दी है। वैसे भी राजनीति में कब क्या हो जाए, कहना मुश्किल होता है। घंटे भर पहले तक दोस्त अचानक दुश्मन और लंबे समय से सियासी दुश्मन कब अचानक दोस्त बन जाएं कहना मुश्किल है। बहरहाल, अगर सपा में टूट होती है तो इसका सबसे व्यापक असर अगले साल यानी 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा। इसके अलावा संसद का गणित भी बदल सकता है। SP अभी राज्यसभा में बड़ी विपक्षी पार्टियों में से एक है और राम गोपाल यादव पार्टी का प्रमुख चेहरा और बुलंद आवाज हैं। उनके टूटने से (हालांकि, हिन्दुस्तान लाइव इसकी पुष्टि नहीं करता है) उच्च सदन में सपा का दमखम कमतर हो सकता है। फिलहाल राज्यसभा में समाजवादी पार्टी के कुल 4 सांसद हैं। अगर बड़ी संख्या में राज्यसभा सांसद टूटे तो सदन में विपक्ष कमजोर हो सकता है। सरकार अपने बिल आसानी से पारित करा सकती है।
INDIA गठबंधन पर क्या असर?
दूसरी तरफ INDIA गठबंधन में सपा का वजूद छोटा पड़ सकता है। गठबंधन का असर भी आगामी चुनावों में हलका हो सकता है और सपा के कमजोर होने से गठबंधन के अंदर भी खींचततान तेज हो सकती है। मसलन, 2027 के विधानसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे को मुद्दे पर कांग्रेस सपा पर हावी हो सकती है। अगर पार्टी का कोई बड़ा गुट अलग हो जाता है या टूट जाता है, तो इससे न सिर्फ़ संगठन को नुकसान होगा, बल्कि चुनावी साल में मतदाताओं के बीच भी सपा की छवि धुमिल हो सकती है।
बसपा और भाजपा पर क्या असर?
अगर समाजवादी पार्टी कमज़ोर होती है, तो इसका फ़ायदा निश्चित रूप से भाजपा को तो मिलेगा ही क्योंकि उसे एकजुट नहीं बल्कि बिखरे विपक्ष से ज्यादा फायदा होता रहा है। विपक्ष के बंटने का सीधा सा गणित है कि भाजपा पर दबाव कम होगा और उसके वोटर एकजुट होंगे, जो उनकी जीत का रास्ता तय करेगा। इससे इतर विपक्ष की दूसरी पार्टी बहुजन समाज पार्टी (BSP) को भी सपा के कमजोर होने का सीधा-सीधा फायदा होगा। हालांकि हाल के वर्षों में चुनावी तौर पर BSP कमजोर हुई है, लेकिन राज्य के कई इलाकों में उसका वोट बैंक अभी भी काफी मज़बूत है। फिलहाल राजभर के आरोप और दावों पर अटकलों का बाजार गर्म है और अखिलेश यादव विपक्षी एकता को मजबूत करने में जुटे हैं ताकि 2027 में सत्ता पर फिर से कब्जा किया जा सके।