Dollar Vs World : क्या अब डॉलर का दौर धीरे-धीरे खत्म होने की ओर बढ़ रहा है? या फिर दुनिया को इसका ऑप्शन मिल चुका है? ऐसे ही कई सवाल इन दिनों चर्चा में हैं, खासकर एक नई रिपोर्ट सामने आने के बाद जिसने वैश्विक आर्थिक सिस्टम को लेकर नई बहस छेड़ दी है.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में OMFIF (ऑफिशियल मॉनेटरी एंड फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस फोरम) के सर्वे का हवाला दिया गया है. इसमें ये दावा किया गया है कि आने वाले वर्षों में दुनिया के केंद्रीय बैंक अपनी विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी घटाने की योजना बना रहे हैं. ये पहली बार बताया जा रहा है जब इतनी बड़ी संख्या में बैंक डॉलर पर निर्भरता कम करने की बात कर रहे हैं.
क्यों बदल रहा है डॉलर को लेकर रुख?
अब तक डॉलर को दुनिया की सबसे भरोसेमंद और स्थिर करेंसी माना जाता रहा है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार- चाहे तेल का सौदा हो या अन्य वस्तुओं का आयात-निर्यात ज्यादातर डॉलर में ही होता आया है. लेकिन, अब ये तस्वीर धीरे-धीरे बदलती नजर आ रही है. कई देश अब अपने व्यापार के लिए स्थानीय करेंसी का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं. साथ ही अमेरिका की नीतियों और जियो-पॉलिटिकल तनावों को लेकर भी चिंताएं बढ़ी हैं. इसका असर डॉलर की स्थिरता पर देखा जा रहा है.
रिपोर्ट में क्या सामने आया?
सर्वे के मुताबिक, केंद्रीय बैंकों को तीन बड़े जोखिम दिखाई दे रहे हैं:
अमेरिका की राजनीतिक अनिश्चितता
वैश्विक जियो-पॉलिटिकल
दुनिया का मल्टी-पोलर फाइनेंशियल सिस्टम की ओर बढ़ना
इन कारणों से कई देश अब अपने रिजर्व को सिर्फ डॉलर तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि उसे अलग-अलग करेंसी और एसेट्स में बांट रहे हैं.
कौन-सी करेंसी बन सकती हैं ऑप्शन?
हालांकि, अभी डॉलर का कोई स्पष्ट विकल्प पूरी तरह सामने नहीं आया है. लेकिन, कुछ करेंसी और एसेट्स को प्राथमिकता मिलती दिख रही है. जैसे- यूरो, चीनी युआन, ब्रिटिश पाउंड, नॉर्वेजियन क्रोन और न्यूज़ीलैंड डॉलर. इसके अलावा सोने की मांग भी लगातार बढ़ रही है.
सोने की ओर बढ़ता झुकाव
रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि कई केंद्रीय बैंक अब अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे हैं. सोने को अब सिर्फ एक निवेश नहीं, बल्कि जियो-पॉलिटिकल जोखिमों से बचाव का सुरक्षित ऑप्शन माना जा रहा है.
क्या डॉलर का वर्चस्व खत्म हो जाएगा?
एनालिस्ट के मुताबिक, फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि डॉलर की वैश्विक पकड़ पूरी तरह खत्म हो जाएगी. अभी भी ये दुनिया की सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में इसकी भूमिका बेहद मजबूत है. हालांकि, बदलाव धीरे-धीरे और लंबे समय में देखने को मिल सकता है.
भारत पर क्या असर पड़ेगा?
अगर डॉलर पर निर्भरता कम होती है, तो भारत जैसे देशों के लिए यह एक अवसर हो सकता है. इससे रुपये में व्यापार को बढ़ावा मिल सकता है और विदेशी मुद्रा भंडार में सोने व अन्य करेंसी का हिस्सा बढ़ सकता है. हालांकि, ये बदलाव तुरंत नहीं बल्कि धीरे-धीरे होगा.