बाहुबली बिहार के: चुनाव में पोस्टर तक नहीं लगाते थे विरोधी, भाइयों को तेजाब से नहला टुकड़े बोरे में भर दिए थे

बिहार में राजनीति और बाहुबल का चोली-दामन का साथ रहा है। कई बाहुबली ऐसे रहे हैं जिन्होंने सियासत का साथ लेकर अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। ये बाहुबली सांसद-विधायक से लेकर मंत्री तक बने। बिहार के बाहुबलियों पर हमारी खास सीरीज ‘बाहुबली बिहार के’ की पहली दो कड़ियों में हमने ऐसे ही दो चेहरों- अनंत सिंह और आनंद मोहन के बारे में बात की थी।

‘बाहुबली बिहार के’ की इस कड़ी के केंद्र में है- मोहम्मद शहाबुद्दीन। शहाबुद्दीन की 2021 में कोरोना महामारी के दौरान जेल में सजा काटते हुए संक्रमण से मौत हो गई थी। 2024 में शहाबुद्दीन की मौत के तीन साल बाद शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब ने लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) में फिर से वापसी की।

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पहले जानें- मोहम्मद शहाबुद्दीन को?
मोहम्मद शहाबुद्दीन का जन्म 10 मई 1967 को बिहार के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में आने वाले सीवान जिले के हुसैनगंज ब्लॉक स्थित प्रतापपुर गांव में हुआ था। शहाबुद्दीन की पत्नी और बेटे को छोड़ दें तो उनके बाकी परिवार के बारे में इक्का-दुक्का जानकारी ही सामने आती है। जैसे की शहाब अपने पिता- शेख हबीबुल्ला और मां मदीना खातून के 10 बच्चों में सबसे छोटे थे। उनके अलावा परिवार में सात बहनें और दो और भाई थे। हालांकि, इनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। शहाबुद्दीन की शादी 1991 में हिना शहाब से हुई। दोनों का एक बेटा- ओसामा शहाब और दो बेटियां- हेरा शहाब और तस्लीम शहाब हैं। ओसामा खुद भी ब्रिटेन से कानून की पढ़ाई कर चुके हैं।

लौटते हैं मोहम्मद शहाबुद्दीन की तरफ। 2004 में चुनाव आयोग को दिए शहाबुद्दीन के हलफनामे पर नजर डाली जाए तो सामने आता है कि उसने बिहार के मुजफ्फरपुर में स्थित बीआर अंबेडकर यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में 1994 में एमए किया। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, पोस्ट ग्रैजुएशन में शहाबुद्दीन को गोल्ड मेडल दिया गया था। इसके बाद उसने पीएचडी पूरी की। तब शहाबुद्दीन की थीसिस का सब्जेक्ट था- द एक्सपेरिमेंट ऑफ कोलीशन गवर्मेंट इन बिहार एंड इट्स एफेक्ट।

शहाबुद्दीन को बाद में राजनीतिक पटल पर चुनौती देने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) ने आरोप लगाया था कि बाहुबली ने अपनी पढ़ाई के लिए न सिर्फ नियमों को तोड़ा-मरोड़ा, बल्कि अकादमिकों में दहशत भर दी। अपनी डिग्री के लिए उसने राजनीतिक रसूख का भी जबरदस्त इस्तेमाल किया।

कैसे हुई अपराध की दुनिया में एंट्री?
मोहम्मद शहाबुद्दीन पढ़ाई के दौर में ही छात्र राजनीति में काफी सक्रिय रहा। बताया जाता है कि ऐसे ही एक समय जब वो चुनाव लड़ने की तैयारी में था, तब उसके समर्थकों ने एक विवाद के बीच जबरदस्त दंगा कराया था।

मोहम्मद शहाबुद्दीन के एफिडेविट के मुताबिक, उस पर पहला केस 1986 में दर्ज हुआ था। यानी महज 19 साल की उम्र में मुकदमा दर्ज हुआ। ये मुकदमासीवान में ही आर्म्स एक्ट की धाराओं में किया गया था। इसके बाद जैसे-जैसे शहाबुद्दीन का सीवान में वर्चस्व बढ़ता गया, वैसे-वैसे उस पर केसों की संख्या भी बढ़ती गई। उस पर हत्या के प्रयास का पहला मामला 1996 में लगा और 1998 आते-आते उस पर हत्या का केस भी जुड़ गया। बताया जाता है कि हुसैनगंज पुलिस स्टेशन में तो शहाबुद्दीन के अपराधों की हिस्ट्री शीट रही और उसे ‘ए’ वर्ग के अपराधियों में शामिल किया गया।
कुल मिलाकर शहाबुद्दीन पर एक समय 40 आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें अपहरण से लेकर हत्या तक के केस शामिल रहे। हालांकि, इन मामलों के बावजूद सीवान में कभी शहाबुद्दीन के खिलाफ आवाज नहीं उठी। आलम यह रहा कि सियासत में एंट्री के बाद से पहली बार दोषी करार दिए जाने तक वह कभी चुनाव नहीं हारा। जेल जाने के बाद ही उसके अजेय राजनीतिक सफर पर रोक लगी।

कैसे जेल में बंद रहते हुए हुई राजनीति में एंट्री?
शहाबुद्दीन की राजनीति में एंट्री की कहानी काफी दिलचस्प है। दरअसल, अपने छात्र जीवन के दौरान ही शहाबुद्दीन राजनीति में उतरने का ख्वाब संजोए था। 1986 में पहली बार केस दर्ज होने के बाद उसका नाम फिरौती से लेकर अपहरण और हत्या के प्रयास के केसों से जुड़ा। नतीजतन शहाबुद्दीन का कई बार जेल आना-जाना हुआ। इस दौरान एक मौका ऐसा आया, जब शहाबुद्दीन ने खुद को कानून के शिकंजे से बचाने के लिए अपनी पैरवी जीरादेई से कांग्रेस विधायक कैप्टन त्रिभुवन नारायण सिंह के सामने लगाई। उस दौरान प्रतापपुर जीरादेई विधानसभा क्षेत्र में ही आता था।

हालांकि, उसूलों के पक्के और ईमानदार छवि वाले त्रिभुवन नारायण ने साफ कह दिया कि वह अपराधियों की कोई पैरवी नहीं करेंगे। बताया जाता है कि यह बात शहाबुद्दीन को चुभ गई और आगे उसने खुद राजनीति में उतरने का मन बना लिया। 1990 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जब शहाबुद्दीन जेल में बंद था, तभी उसने एलान कर दिया कि वह त्रिभुवन नारायण के खिलाफ चुनाव लड़ेगा।
खैर चुनाव हुए, जेल में बंद रहने के बावजूद शहाबुद्दीन के क्राइम नेटवर्क ने सीवान में डर का माहौल पैदा कर दिया। उस दौरान चुनाव बैलट पेपर से हुआ करते थे। शहाबुद्दीन के गिरोह ने कई जगह न सिर्फ बूथ लूटने बल्कि फर्जी वोटिंग के भी आरोप लगे। जब नतीजे आए तो त्रिभुवन सिंह 378 वोटों से हार गए। इस तरह शहाबुद्दीन ने निर्दलीय लड़ते हुए कांग्रेस के कद्दावर नेता को शिकस्त दे दी।

चूंकि यह जीत एक बाहुबली की थी और वह भी कांग्रेस के खिलाफ, ऐसे में कांग्रेस को 1990 के चुनाव में हराने वाली लालू प्रसाद के नेतृत्व वाली जनता दल ने शहाबुद्दीन को पार्टी में शामिल होने का प्रस्ताव दे दिया। उसने इसे लगे हाथ स्वीकार कर लिया। बस यह कदम था और शहाबुद्दीन जेल से देखते ही देखते रिहा हो गया।

…और फिर सीवान में चली समानांतर सरकार
बिहार में जैसे-जैसे मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की सरकार ने अपनी पकड़ मजबूत की, वैसे-वैसे सीवान में शहाबुद्दीन खुद-ब-खुद मजबूत होता चला गया। कहा जाता है कि 1990 के मध्य में सीवान में शहाबुद्दीन एक समानांतर सरकार चला रहा था, जो कि जमीन विवाद से लेकर डॉक्टरों की फीस की सीमा और शादी में आ रही समस्याओं तक पर फैसला सुनाती थी। इस दौरान जो भी सीवान में शहाबुद्दीन के शासन को चुनौती देता था, उसे खुद ‘साहब’ के लोग सजा देते थे। उस दौर में शहाबुद्दीन पर जो रिपोर्ट्स छापीं उसके मुताबिक, लेफ्ट कार्यकर्ता जो लोगों को अपने अधिकार की आवाज उठाने और कानून की शरण में जाने की सलाह देते थे, वे शहाबुद्दीन का सबसे आसान निशाना बनते थे। शहाबुद्दीन ने आसानी से 1995 में चुनाव जीत लिया।

इसी दौरान एक वामदल कार्यकर्ता की हत्या भी हुई थी। ये कार्यकर्ता जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के पूर्व अध्यक्ष चंद्रशेखर थे, जिनकी 1997 में शहाबुद्दीन के लोगों ने बर्बर हत्या कर दी। इस मामले में बाद में शहाबुद्दीन दोषी भी करार हुआ और उसे जेल की सजा हुई।

लालू बुलाते थे छोटा भाई, हत्या मामले में दोषी साबित होने बाद भी राजद ने निकाला नहीं
2001 में एक एनजीओ पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया था कि राजद सरकार शहाबुद्दीन के खिलाफ कानूनी मामलों को उलझा रही है और बाहुबली को बचा रही है। पुलिस उसकी आपराधिक गतिविधियों से आंख मूंद रही है और किसी भी मामले में गवाह उसके खिलाफ खड़े नहीं हो पा रहे हैं। सीवान जिला उसकी जागीर बन चुका है और वह उसका शासक।

पीयूसीएल की इस रिपोर्ट पर उस दौर की कुछ मीडिया रिपोर्ट्स मुहर भी लगाती हैं। मीडिया ग्रुप ‘द प्रिंट’ के पत्रकार दीपक मिश्र ने 2021 में खुलासा किया था कि जब वे एक बार सीवान रिपोर्टिंग के लिए गए थे, तो बीच रात में एके-47 लिए दर्जन भर लोग उनके होटल आ गए और उन्हें शहाबुद्दीन के पास ले गए। रिपोर्टर के मुताबिक, शहाबुद्दीन ने यहां उनसे कहा था कि सीवान में उनके खिलाफ किसी से सुनना है तो वह कौशल्या देवी के पास जाएं, जो कि चंद्रशेखर प्रसाद की मां हैं। यह बात काफी सच भी थी, क्योंकि कौशल्या देवी के अलावा सीवान में किसी ने शहाबुद्दीन के खिलाफ कुछ नहीं कहा।

बताया जाता है कि शहाबुद्दीन का पूरे क्षेत्र में ऐसा रुतबा था कि जब वह चुनाव लड़ता था तब उसके खिलाफ कोई भी राजनीतिक दल अपने बैनर या पोस्टर तक नहीं लगाता था। इतना ही नहीं डॉक्टरों को सीवान में अपना परामर्श शुल्क प्रति मरीज 50 रुपये तक रखने के ही निर्देश थे। इसके अलावा उस दौर के जिला अधिकारी तक शहाबुद्दीन को साहब कह कर संबोधित करते थे।

लालू प्रसाद यादव के दौर में शहाबुद्दीन की ताकत असीमित थी। खुद लालू सार्वजनिक तौर पर शहाबुद्दीन को अपना ‘छोटा भाई’ बताते थे। यहां तक कि 2007 में जब उसे हत्या के मामले में दोषी करार दिया गया, तो राजद ने उसे अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी से नहीं निकाला।

वह केस, जिसके बाद दुनिया के सामने आई थी शहाबुद्दीन की बर्बरता
शहाबुद्दीन का नाम एक केस में सबसे ज्यादा लिया जाता है। यह मामला था सीवान में ही रहने वाले दो भाइयों को तेजाब से नहलाकर उनकी हत्या करने का। बताया जाता है कि 2004 में उगाही और संपत्ति के एक विवाद को लेकर शहाबुद्दीन इतना भड़क गया था कि उसने चंदाबाबू के तीन बेटों का अपहरण करा लिया। इनमें से एक बेटा तो तब बचकर भाग निकला था, लेकिन बाकी दो बेटों को शहाबुद्दीन ने तेजाब से नहलवाकर मारा था। इतना ही नहीं इन लोगों की लाशों के टुकड़े किए और उन्हें नमक से भरे बोरों में भरवाकर रखा था। इस घटना में भी बाद में शहाबुद्दीन को दोषी पाया गया और उसे आजीवन कारावास की सजा हुई।

ऐसे खत्म हुआ शहाबुद्दीन का बाहुबल
2005 में सुशासन को अपना नारा बनाकर चुनाव लड़े नीतीश कुमार को जीत मिली। इसके साथ ही राज्य में राष्ट्रीय जनता दल और लालू प्रसाद यादव का शासन खत्म हुआ। यूं तो मोहम्मद शहाबुद्दीन सीवान में सुरक्षित था, लेकिन नीतीश कुमार अपराध को जड़ से खत्म करने का वादा कर सत्ता में आए थे। ऐसे में नीतीश ने सीवान जेल के अंदर ही एक विशेष अदालत के गठन का आदेश दे दिया। इस जेल में अकेले शहाबुद्दीन पर हत्या, उगाही और आर्म्स एक्ट की धाराओं में 18 से ज्यादा मामलों पर सुनवाई शुरू हुई। देखते ही देखते शहाबुद्दीन का प्रभाव सीवान में कम होने लगा।

2007 में शहाबुद्दीन को पहली बार भाकपा-माले के कार्यकर्ता की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इसके अलावा सीवान के एसपी एसके सिंहल की हत्या के प्रयास के मामले में उसे 10 साल की सजा सुनाई गई। 2015 में शहाबुद्दीन को चंदाबाबू के दो बेटों की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा हुई।