बिहार में ‘नल-जल योजना’ वाला पीने का पानी कितना सुरक्षित?

बिहार विधानसभा के चालू सत्र में राज्य के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (पीएचईडी) के जिम्मेदार मंत्री की इस स्वीकारोक्ति ने एक बार फिर पेयजल की गुणवत्ता को लेकर बहस छेड़ दी है। प्रदेश के कई हिस्सों में ग्राउंड वाटर में आयरन, आर्सेनिक व फ्लोराइड तो पहले से ही चिंता का सबब बनी हुई थी।

दरअसल, सत्ता पक्ष के विधायक दुलाल चंद्र गोस्वामी सहित अन्य सदस्यों ने सीमांचल के कई इलाकों में दूषित पेयजल के कारण कैंसर के बढ़ते मामलों पर चिंता जताते हुए बिहार विधानसभा में सरकार का ध्यान आकृष्ट किया था। उनका कहना था कि नल-जल योजना का पानी इतना दूषित है कि लोग इसके बदले हैंडपंप का पानी पी रहे हैं। इस पर विभागीय मंत्री ने स्थिति की भयावहता को स्वीकार किया तथा सदन को बताया कि 14 जिलों के पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा अधिक है और 12 जिले में आयरन पाया गया है।

ग्राउंड वाटर के दूषित होने के कारण राज्य सरकार पेयजल के रूप में सतही जल के उपयोग को बढ़ावा दे रही है। जिस हैंडपंप से नाइट्रेट निकल रहा, उस पर लाल निशान लगाए जा रहे हैं। नाइट्रेट की ज्यादा मात्रा से शिशुओं में मेथेमोग्लोबिनेमिया या ब्लू बेबी सिंड्रोम हो सकता है। वयस्क थोड़ी ज़्यादा मात्रा को सहन कर सकते हैं, किंतु लगातार उपयोग उनके लिये भी हानिकारक है।

पानी में कहीं यूरेनियम, नाइट्रेट तो कहीं कैडमियम
बिहार के सीमांचल के इलाके जैसे पूर्णिया, किशनगंज, अररिया, कटिहार का ग्राउंड वाटर पीने के लायक नहीं रह गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, पूर्णिया और किशनगंज के ग्राउंड वाटर में नाइट्रेट और आर्सेनिक की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा भारतीय मानक ब्यूरो के द्वारा निर्धारित मानक से कई गुना ज्यादा पाई गई है।

इसी तरह इन इलाकों के सहित राज्य के 33 जिलों में आयरन की मात्रा एक ग्राम प्रति लीटर से अधिक दर्ज की गई है। कहीं यूरेनियम तो कहीं कैडमियम तो कहीं क्रोमियम जैसी भारी धातुओं की मात्रा भी निर्धारित मानक से अधिक पाई गई है। फर्टिलाइजर का अंधाधुंध उपयोग, सीवेज का रिसाव तथा औद्योगिक कचरे का अनुचित निपटान ही भूगर्भीय जल में हानिकारक तत्वों की बढ़ती मात्रा का मुख्य कारण माना जा रहा है। महावीर कैंसर संस्थान, पटना के वैज्ञानिकों के शोध में यह साफ हो गया राज्य में गंगा नदी के मैदानी इलाकों में आर्सेनिक युक्त पानी से गॉल ब्लैडर कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पिछले 10-11 सालों में गंगा के मैदानी इलाकों में खासकर कैंसर के मरीजों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। इसके अलावा अल्जाइमर और फ्लोरोसिस जैसी बीमारी भी फैल रही है। बिहार आर्थिक सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य के करीब सभी जिलों में आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन का प्रदूषण पेयजल को दूषित बना रहा है। 20 जिलों के ग्राउंड वाटर में आर्सेनिक तो अन्य में फ्लोराइड की उच्च मात्रा पाई गई है।

जल विशेषज्ञों के अनुसार ग्राउंड वाटर की गुणवत्ता में गिरावट के कई कारण हैं। इनमें शहरीकरण, तेज़ी से बढ़ता औद्योगीकरण, औद्योगिक और नगर निकायों के कचरे का बिना उपचार निस्तारण, खेती में उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, सिंचाई के लिए भूगर्भीय जल का मनमाना दोहन और जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव शामिल हैं।

सरकार ने किया कोर ग्रुप का गठन
असददुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के बिहार प्रदेश अध्यक्ष व विधायक अख्तरुल ईमान ने सदन को बताया था कि सीमांचल के इलाकों कटिहार, पूर्णिया, किशनगंज, अररिया और सुपौल जिले में केंद्रीय भूजल बोर्ड ने पेयजल के 634 नमूनों की जांच की थी। सभी में आयरन की मात्रा मानक से अधिक थी।

महावीर कैंसर संस्थान की एक रिपोर्ट के अनुसार इन इलाकों में माउथ, लीवर व ब्रेस्ट कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इसी के जवाब में स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने बताया कि सीमांचल के इलाके में आर्सेनिक तथा यूरेनियम की मौजूदगी तथा कैंसर के बढ़ते मामलों से चिंतित सरकार ने इस संबंध में शोध करने के लिए पटना स्थित आइजीआइएमएस, पटना एम्स, महावीर कैंसर अस्पताल तथा होमी भाभा कैंसर अस्पताल, मुजफ्फरपुर के समन्वय से एक कोर ग्रुप का गठन राज्य सरकार ने किया है। यह कोर ग्रुप कैंसर के उचित उपचार, दीर्घकालिक प्रबंधन, स्क्रीनिंग तथा जनता में बीमारी के बारे में जागरूकता फैलाने का काम करेगा।

ब्रेस्ट कैंसर पर स्पेशलाइजेशन कर रही पटना की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अनामिका कहती हैं, “कई इलाकों में आर्सेनिक फूड चेन में प्रवेश कर गया है। पीने के पानी में आर्सेनिक की मात्रा यदि अधिक है तो लीवर, किडनी, लंग्स कैंसर होने की संभावना रहती है। पीएम 2.5 जैसे पार्टिकुलेट मैटर के संपर्क में ज्यादा समय तक रहने के कारण लंग्स की कोशिकाएं बदलने लगती हैं,जो कैंसर का कारण बनती हैं। अब तो स्मोकिंग नहीं करने वालों में एडिनोकार्सिनोमा आम है।” औद्योगिक प्रदूषण के कारण पानी में आने वाले क्रोमियम-6 से पेट के कैंसर व अन्य बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।

हर घर नल का जल कितना कारगर
राज्य सरकार ग्रामीण तथा शहरी इलाकों में अपनी महत्वाकांक्षी ‘हर घर नल का जल योजना’ के तहत पाइप के जरिए शुद्ध पानी पहुंचा रही है। जिससे जल जनित बीमारी का खतरा एक हद तक टला है। हालांकि, कई जगह यह योजना ठप पड़ी हुई है। कई जगह पानी की टंकी केवल ढांचे के रूप