नीतीश-तेजस्वी अलर्ट रहें… बिहार चुनाव में ओवैसी ने लगा दिया पूरा जोर, सीमांचल में उठी ‘छोटी लहर’ भी कर जाएगी बड़ा असर!

पटना. बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से ठीक पहले असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने बड़ा राजनीतिक कदम उठाया है. पार्टी ने भीम आर्मी और बसपा के साथ गठबंधन की घोषणा की है. AIMIM प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ने बताया कि तीनों दल मिलकर 100 सीटों पर उतरेंगे, जिसमें भीम आर्मी 25 सीटों पर लड़ेगी. यह ‘ग्रैंड डेमोक्रेटिक अलायंस’ NDA और महागठबंधन को चुनौती देगा. बता दें कि 2020 में AIMIM ने सीमांचल में 5 सीटें जीतीं जिसने महागठबंधन की सत्ता-सियासत का खेल बिगाड़ दिया था. अब ओवैसी की पार्टी का दावा है कि अब वोट विभाजन रुकेगा. ऐसे में सवाल यह कि क्या यह तीसरा विकल्प बिहार की सियासत बदल देगा? सवाल यह भी कि इसका सीमांचल की सियासत पर क्या असर पड़ने वाला है. बता दें कि सीमांचल ही वह क्षेत्र है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि इस क्षेत्र की 24 सीटों पर बेहतर प्रदर्शन करने वाले गठबंधन के लिए ही सत्ता की राह खुलेगी. मुस्लिम पॉलिटिक्स के गढ़ इस इलाके में असदुद्दीन ओवैसी ने पूरा जोर लगा दिया है और अपने भाषणों से मुस्लिम मतों की गोलबंदी के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं. जाहिर है इससे न केवल महागठबंधन बल्कि नीतीश कुमार की जेडीयू के लिए खतरा बढ़ गया है.

बता दें कि पूर्णिया प्रमंडल में आने वाले जिलों को मिलाकर सीमांचल बनता है. बिहार के उत्तर-पूर्वी हिस्से में पश्चिम बंगाल की सीमा से सटा इलाका है जिसमें चार जिले-अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार शामिल हैं. कुल 24 विधानसभा सीटों वाला यह इलाका बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में इसी इलाके ने विपक्ष यानी महागठबंधन को सबसे बड़ा झटका दिया था. मुस्लिम वोटों की अधिकता के बावजूद भाजपा-जेडीयू गठबंधन ने यहां उम्मीद से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया. पिछले चुनाव में मुस्लिम वोटों के बिखराव ने भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) और जनता दल यूनाइटेड (Janata Dal United) को अप्रत्याशित बढ़त दी थी. यही कारण है कि सीमांचल इस बार सभी दलों की चुनावी रणनीति का केंद्र बन चुका है.

मुस्लिम वोटों की ताकत और उसका असर
सीमांचल में औसतन मुस्लिम आबादी करीब 46% है. किशनगंज में तो यह आंकड़ा लगभग 68% तक पहुंच जाता है. कटिहार और अररिया में 44–45% और पूर्णिया में करीब 39% मुस्लिम जनसंख्या है. यही इलाका पूरे बिहार में मुस्लिम आबादी 18% तक बढ़ा देता है. ऐसे में यह सहज लगता है कि इस क्षेत्र में भाजपा को सीट मिलना मुश्किल होना चाहिए. लेकिन 2020 में तस्वीर कुछ और ही थी. भाजपा ने 8 सीटें जीतीं और जदयू ने 4, जबकि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen) यानी AIMIM ने 5 सीटें जीतकर विपक्ष को चौंका दिया. मुस्लिम वोटों का बिखराव ही भाजपा और जदयू के लिए फायदे का सौदा साबित हुआ.

किशनगंज जिले में मुस्लिम आबादी 68% से भी अधिक है. यहां पारंपरिक रूप से कांग्रेस और आरजेडी का प्रभाव रहा है. लेकिन, पिछली बार AIMIM ने इस इलाके में सेंध लगाकर कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी थी. इस बार भी AIMIM और कांग्रेस के बीच सीटों की खींचतान महागठबंधन के लिए सिरदर्द बन सकती है. यहां भाजपा का संगठन अपेक्षाकृत कमजोर है, लेकिन अगर मुस्लिम वोट बंटते हैं तो भाजपा एक या दो सीटों पर टक्कर में आ सकती है.

अररिया: भाजपा के लिए अनुकूल जमीन

अररिया में मुस्लिम आबादी 45% के आसपास है. इसके बावजूद यह इलाका भाजपा और जदयू के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल माना जाता है. यहां भाजपा ने पिछले चुनाव में साफ बढ़त हासिल की थी. इसका मुख्य कारण था मुस्लिम वोटों का AIMIM और कांग्रेस के बीच बिखर जाना और एनडीए के समर्थक वोटों का एकमुश्त भाजपा को मिलना था. इस बार AIMIM के साथ-साथ जन सुराज और अन्य दल भी मैदान में होंगे जिससे मुकाबला बहुकोणीय होने की संभावना है.

पूर्णिया: एनडीए का मजबूत गढ़, पर…
पूर्णिया जिले में मुस्लिम आबादी करीब 39% है और यह इलाका भाजपा के लिए परंपरागत रूप से मज़बूत माना जाता है. पिछले चुनाव में भाजपा ने यहां कई सीटों पर निर्णायक बढ़त बनाई थी और कई सीटों पर जीत का अंतर 5–10% से कम था. इससे साफ है कि जन सुराज जैसे नए खिलाड़ियों का असर इस बार मुकाबला और टाइट कर सकता है.

कटिहार: महागठबंधन का इलाका, लेकिन…
कटिहार में मुस्लिम आबादी करीब 45% है और यह इलाका ऐतिहासिक रूप से महागठबंधन का गढ़ रहा है. लेकिन पिछली बार AIMIM और अन्य दलों के मैदान में उतरने से कांग्रेस को नुकसान हुआ और भाजपा ने कई सीटों पर मज़बूत प्रदर्शन किया. इस बार AIMIM और जन सुराज के उम्मीदवार फिर से कांग्रेस-आरजेडी के लिए चुनौती बन सकते हैं.

पेचीदा हुआ सीमांचल का समीकरण
ऐसे में 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में मुकाबला और भी पेचीदा होता जा रहा है जहां विभिन्न राजनीतिक दलों की रणनीतियां एक-दूसरे से टकरा रही हैं. 2020 में भाजपा ने 8 सीटें जीती थीं और अब वह मुस्लिम वोटों के बिखराव पर भरोसा कर रही है, जबकि जदयू, ने चार सीटें जीती थीं, और इस बार वह एनडीए के संयुक्त समीकरण पर फोकस कर रही है. दूसरी ओर, आरजेडी कुछ मुस्लिम वोटों की गोलबंदी की कोशिश में है, वहीं कांग्रेस AIMIM से सीटों की खींचतान में उलझी हुई है. AIMIM ने 2020 में 5 सीटें जीती थीं और इस बार मुस्लिम वोटों पर सीधा दावा ठोक रही है. जबकि, नई पार्टी जन सुराज निर्णायक वोट बैंक बनने की कोशिश में जुटी है. अन्य नए दल मुस्लिम और युवा वोटों पर नजर गड़ाए हुए हैं. जाहिर है इस जटिल समीकरण में छोटी लहर भी बड़ा नतीजा बदल सकती है जो चुनाव को और रोचक बना रहा है.
अगर मुस्लिम वोट बिखरते हैं तो…

पिछली बार सीमांचल की 24 में से 10 सीटों पर जीत का अंतर 10% से कम था. यानी यहां मुकाबले बेहद नज़दीकी रहे. AIMIM और जन सुराज जैसे खिलाड़ियों के उतरने से इस बार यह अंतर और भी कम हो सकता है. मुस्लिम वोटों की गोलबंदी अगर होती है तो महागठबंधन को फायदा मिलेगा, दूसरी ओर अगर वोट बिखरते हैं तो एनडीए फिर से बढ़त बना सकता है. इसीलिए सीमांचल 2025 के बिहार चुनाव की ‘बड़ी जंग’ का मैदान बनने जा रहा है.

सीमांचल क्यों है बिहार की सत्ता की चाबी?
सीमांचल की 24 सीटें बिहार चुनाव 2025 में किसी भी गठबंधन के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती हैं. पिछली बार मुस्लिम वोटों के बिखराव ने एनडीए को बढ़त दी थी, लेकिन इस बार AIMIM, जन सुराज, कांग्रेस, आरजेडी, भाजपा और आप जैसे कई दल मैदान में हैं. ऐसे में एक छोटा-सा वोट स्विंग भी बड़े नतीजे तय कर सकता है. अगर मुस्लिम वोट एकजुट हुए तो विपक्ष को राहत मिल सकती है, और अगर बिखरे तो एनडीए दोबारा यहां अपनी स्थिति मज़बूत कर सकता है. यही वजह है कि सीमांचल पर इस बार सबकी नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि बिहार की सत्ता की चाबी यहीं से निकल सकती है.