बिहार सरकार उच्च शिक्षा को लेकर नया विधेयक विधानसभा में पेश करने जा रही है लेकिन बीजेपी और जेडीयू के नेताओं ने इसका विरोध किया है। बिहार की विधानसभा और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को बीजेपी और जेडीयू के नेताओं ने इस संबंध में पत्र भी लिखा है।
क्या है इस विधेयक में?
इस विधेयक के पास होने के बाद बिहार में चल रहे अंडरग्रेजुएट कॉलेज राज्य सरकार के उच्च शिक्षा विभाग के नियंत्रण में आ जाएंगे। ये कॉलेज अभी बिहार के विश्वविद्यालयों से संबंद्ध हैं और राज्य में ऐसे कम से कम 500 कॉलेज हैं।
मौजूदा वक्त में राज्यपाल राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति हैं लेकिन नए विधेयक के पास होने के बाद केवल पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रम वाले कॉलेज ही राज्यपाल के नियंत्रण में रहेंगे।
किन नेताओं ने लिखा पत्र?
इस मामले में मुख्यमंत्री को पत्र लिखने वाले नेताओं में जेडीयू के संजीव कुमार सिंह, वीरेंद्र नारायण यादव, अफाक अहमद और नीरज कुमार, भाजपा के नवल किशोर यादव और संजय कुमार सिंह शामिल हैं। इन नेताओं का कहना है कि ग्रेजुएट कॉलेजों को विश्वविद्यालयों से अलग करने से विश्वविद्यालय प्रणाली का मूल स्वरूप बदल जाएगा।
पत्र में कहा गया है कि राज्य के विश्वविद्यालय सिलेबस तैयार करना, एग्जाम आयोजित करने सहित कई और काम करते हैं। अगर मौजूदा ढांचे में बदलाव किया गया तो इससे पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षा व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। यह भी कहा गया है कि अगर यह विधेयक पारित हो जाता है तो शिक्षकों के तबादले, पोस्टिंग शिक्षकों की नियुक्ति सहित कई अहम फैसले अकादमिक परिषद और सिंडिकेट जैसे लोकतांत्रिक विश्वविद्यालय निकायों से नौकरशाहों के हाथ में चले जाएंगे।
पत्र में तर्क दिया गया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और हैदराबाद विश्वविद्यालय जैसे शीर्ष स्तर के संस्थान इसलिए आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि शैक्षणिक फैसले लेने का अधिकार पूरी तरह से विश्वविद्यालयों के पास ही है।
जेडीयू और बीजेपी के नेताओं का यह भी कहना है कि इस तरह का प्रस्तावित विधेयक राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की भावना के बिलकुल खिलाफ है। पत्र में मुख्यमंत्री से विधेयक की व्यापक समीक्षा करने के लिए इसे सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड करने की मांग की गई है।
बीजेपी और जेडीयू के नेताओं ने मुख्यमंत्री से अपील की है कि विश्वविद्यालयों, शिक्षक संघों, शिक्षाविदों और छात्रों के प्रतिनिधियों के साथ विचार विमर्श के बिना इस विधेयक को पास नहीं किया जाना चाहिए।