पानीपत/सोनीपत: एक बदहाल अस्पताल के कमरे के अंदर, सिर पर शॉल ओढ़े, 32-साल की पूनम एक मनोचिकित्सक और कुछ पुलिस अधिकारियों के सामने बैठी थी. तीन दिन की पुलिस रिमांड पूरी होने के बाद, उसकी रेगुलर मनोवैज्ञानिक जांच की जा रही थी. 50 आसान सवाल—उसकी याददाश्त, समझ और इरादे को परखने के लिए. उसने कुछ सवालों के जवाब दिए, कुछ से बचती रही. जब मनोचिकित्सक ने पूछा कि क्या उसने चार बच्चों—इशिका, शुभम, जिया और विधि की हत्या की है, तो पूनम रुकी, फिर सिर हिला दिया.
उसने कहा, “मुझे नहीं पता बाकी तीन कैसे मरे, मैंने सिर्फ विधि को मारा था.”
करीब 40 किलोमीटर दूर, पानीपत के सिविल अस्पताल के कमरे से अलग, पानीपत के नौलथा गांव और सोनीपत के सिवाह में परिवार और पड़ोसी एक बिल्कुल अलग कहानी बताते हैं. यह कहानी शादियों, पानी की टंकियों, बंद दरवाजों और एक ऐसे पैटर्न से जुड़ी है, जिसे नजरअंदाज करना असंभव है.
भावड़ गांव की रहने वाली पूनम पर 2023 से 2025 के बीच चार बच्चों की हत्या का आरोप है, जिनमें उसका अपना दो साल का बेटा भी शामिल है. आरोप है कि उसने इन मौतों को हादसों में डूबने के रूप में दिखाया. हरियाणा पुलिस का कहना है कि उसने “ईर्ष्या” और “गहरे मानसिक असंतुलन” के चलते ऐसा किया और उन बच्चों को निशाना बनाया, जिन्हें वह “ज्यादा सुंदर” या “ज्यादा प्यार पाने वाले” मानती थी. जांचकर्ताओं के मुताबिक, हत्याओं का एक पैटर्न था—बच्चों को अकेला छोड़ा जाना, पानी के बर्तन ठीक जगह पर रखे जाना, संघर्ष के कोई निशान नहीं और मौतों को दुखद हादसा मान लिया जाना.
हाल ही में एक पारिवारिक शादी में 6 साल की विधि की मौत के बाद पूनम की गिरफ्तारी हुई और इसके साथ ही उस पर तुरंत नैतिक फैसला सुना दिया गया. परिवार और गांव में परिचित ठप्पे लगभग तय समय पर लग गए, साइको, तंत्र-मंत्र में विश्वास रखने वाली, ईर्ष्यालु महिला, हत्यारी मां. हर वजह समाज की उस समझ में फिट बैठती है, जिससे वह उन महिलाओं को देखता है जो तय सीमाओं को लांघती हैं, कि वे भूत-प्रेत से ग्रस्त हैं, जलनखोर हैं, अस्थिर हैं या बुरी हैं.
जिस पर कम ध्यान दिया गया है, वह है पूनम के अपने बदलते बयान—कबूलनामा, फिर उससे मुकरना, तीन मौतों से इनकार और एक क्लिनिकल जांच जिसमें कोई पहचानी जा सकने वाली मानसिक बीमारी नहीं पाई गई. आखिरी मौत के अलावा अब तक कोई ठोस फॉरेंसिक सबूत न होने के कारण, यह मामला अपराध और समझ के बीच एक असहज जगह पर अटका हुआ है. यह मंशा, जिम्मेदारी और उन सामाजिक दबावों पर कठिन सवाल खड़े करता है, जिनके चलते महिलाओं द्वारा की गई हिंसा को समझने से पहले ही समझा लिया जाता है.
मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषक नीतू सरीन ने कहा, “पूनम के मामले में जो हुआ, उसे इस तरह देखा जा सकता है कि हमारा समाज लड़कियों को एक खास तरह से दिखने की सीख देता है. वे गोरी हों, पतली हों और ठीक-ठाक दिखें, ताकि दूसरों को स्वीकार्य हों, लेकिन हम उन्हें यह नहीं सिखाते कि अपने लिए कुछ चाहने का मतलब क्या होता है. एक तरह से, ये चरम हालात इस बात का विकृत रूप हैं कि महिला होने का मतलब क्या बना दिया गया है, सिर्फ अच्छी शक्ल-सूरत तक सीमित.”
1 दिसंबर को जब बारात निकलने की तैयारी हो रही थी, तब नए कपड़े पहने विधि, जो रिश्तेदार बच्चों के बीच इधर-उधर दौड़ रही थी, अफरा-तफरी में गायब हो गई. एक घंटे से ज्यादा वक्त तक परिवार के लोग उसे ढूंढते रहे—घर में, उसका नाम पुकारते हुए, उन कमरों में भी जहां पहले ही तलाश हो चुकी थी.