चीन के वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्रॉनिक कचरे यानी ई-वेस्ट से सोना निकालने का एक ऐसा तरीका खोजा है, जो तेज भी है, सस्ता भी और पर्यावरण के लिए पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित भी. इस नई तकनीक से पुराने मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से 20 मिनट से भी कम समय में 98 प्रतिशत से ज्यादा सोना निकाला जा सकता है. अगर यह तरीका बड़े स्तर पर अपनाया गया, तो यह पूरी दुनिया में ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग का तरीका बदल सकता है और पारंपरिक सोने की खदानों पर निर्भरता भी कम हो सकती है.
किन वैज्ञानिकों ने विकसित की यह तकनीक?
यह नई तकनीक चीन की Guangzhou Institute of Energy Conversion और South China University of Technology के वैज्ञानिकों ने मिलकर विकसित की है. ये दोनों संस्थान Chinese Academy of Sciences से जुड़े हुए हैं. वैज्ञानिकों का दावा है कि यह प्रक्रिया कमरे के सामान्य तापमान पर काम करती है और इसके लिए महंगे या खतरनाक केमिकल्स की जरूरत नहीं पड़ती. यही वजह है कि इसे अब तक की सबसे किफायती और सुरक्षित गोल्ड रिकवरी तकनीक माना जा रहा है.
लागत कम, असर ज्यादा
शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस नए तरीके से सोना निकालने की लागत मौजूदा मार्केट प्राइस की तुलना में करीब एक-तिहाई है. यानी जितने पैसों में पहले थोड़ा सा सोना निकाला जाता था, अब उसी लागत में कहीं ज्यादा सोना रिकवर किया जा सकता है. खास बात यह है कि पुराने मोबाइल फोन के CPU और घरेलू इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के PCB से यह तकनीक 98.2 प्रतिशत तक सोना निकालने में सफल रही है.
ई-वेस्ट क्यों बन चुका है बड़ी समस्या?
आज के समय में ई-वेस्ट दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाले कचरे में से एक है. World Health Organization के मुताबिक, हर साल ई-वेस्ट की मात्रा 26 लाख टन की रफ्तार से बढ़ रही है. अनुमान है कि 2030 तक यह आंकड़ा 82 मिलियन टन तक पहुंच सकता है. पुराने कंप्यूटर, मोबाइल फोन, बड़े घरेलू उपकरण और मेडिकल मशीनें इस ई-वेस्ट का बड़ा हिस्सा हैं. इनमें सोना और पैलेडियम जैसी कीमती धातुएं होती हैं, जिनका इस्तेमाल बेहतर कंडक्टिविटी और जंग से बचाव के लिए किया जाता है.
जहरीले केमिकल्स से छुटकारा
अब तक सोना निकालने के पारंपरिक तरीकों में साइनाइड जैसे जहरीले केमिकल्स का इस्तेमाल होता रहा है, जो पर्यावरण और इंसानों दोनों के लिए खतरनाक हैं. इस समस्या को हल करने के लिए चीनी वैज्ञानिकों ने एक नया ‘सेल्फ-कैटलिटिक लीचिंग’ मैकेनिज्म तैयार किया है. इसमें न तो किसी बाहरी कैटलिस्ट की जरूरत होती है और न ही तेज रसायनों की. इस प्रक्रिया में सिर्फ पोटैशियम पेरॉक्सिमोनोसल्फेट और पोटैशियम क्लोराइड के साधारण पानी वाले घोल का इस्तेमाल होता है.
कैसे काम करता है यह नया तरीका?
जब यह घोल सोने या पैलेडियम की सतह के संपर्क में आता है, तो धातु खुद कैटलिस्ट की तरह काम करने लगती है. इस दौरान ऐसे रिएक्टिव ऑक्सीडेंट बनते हैं, जो धातु के कणों को तोड़ देते हैं और क्लोराइड आयन उन्हें घोल में घुलने में मदद करते हैं. इसके बाद सोने को आसानी से अलग कर लिया जाता है. वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया को समझने के लिए कई टेस्ट और स्पेक्ट्रोस्कोपिक एनालिसिस भी किए हैं.
कम खर्च में ज्यादा सोना
रिसर्च के मुताबिक, सिर्फ 10 किलो पुराने सर्किट बोर्ड से करीब 1.4 ग्राम सोना निकाला जा सकता है, जिसकी कुल लागत लगभग 72 डॉलर आती है. यानी प्रति औंस सोने की कीमत करीब 1,455 डॉलर पड़ती है, जो मौजूदा अंतरराष्ट्रीय बाजार कीमत से काफी कम है. हाल ही में सोने की कीमत 4,400 डॉलर प्रति औंस से भी ऊपर पहुंच चुकी है और अनुमान है कि आने वाले सालों में यह 10,000 डॉलर प्रति औंस तक जा सकती है.
ऊर्जा की बचत और कम प्रदूषण
इस नई तकनीक से सिर्फ पैसे ही नहीं बचते, बल्कि ऊर्जा की खपत भी करीब 62.5 प्रतिशत कम हो जाती है. इसके अलावा, साइनाइड बेस्ड तरीकों की तुलना में रसायनों का खर्च 93 प्रतिशत तक घट जाता है. सबसे बड़ी बात यह है कि इस प्रक्रिया में जहरीला कचरा बहुत कम निकलता है और हाई-प्योरिटी गोल्ड आसानी से हासिल किया जा सकता है.