‘होर्मुज वाली गली’ जाने की नहीं पड़ेगी जरूरत? गल्फ देशों ने बना लिया मेगा प्लान; समंदर में बनेगा नया रास्ता

मिडिल ईस्ट में लगातार बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास जहाजों पर हमलों के बाद खाड़ी देशों ने अपनी ऊर्जा रणनीति में बड़ा बदलाव शुरू कर दिया है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE), इराक और सऊदी अरब अब ऐसे वैकल्पिक रास्ते तैयार कर रहे हैं, जिनके जरिए तेल का निर्यात स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भर हुए बिना किया जा सके. इसका मकसद केवल कारोबार को सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि क्षेत्रीय तेल आपूर्ति पर ईरान के प्रभाव को भी सीमित करना है. युद्ध से पहले दुनिया के कुल तेल कारोबार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी जलमार्ग से गुजरता था. ऐसे में यहां किसी भी तरह की रुकावट का असर सीधे वैश्विक बाजार और तेल की कीमतों पर पड़ता है.

हाल के महीनों में ईरान ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर टोल लगाने की योजना का ऐलान किया है. अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि कुछ मामलों में तेल टैंकरों से सुरक्षित आवाजाही के बदले भारी रकम मांगी गई. इन घटनाओं के बाद खाड़ी देशों ने यह महसूस किया कि लंबे समय तक केवल एक समुद्री रास्ते पर निर्भर रहना जोखिम भरा साबित हो सकता है.

2027 तक तैयार हो सकती हैं नई पाइपलाइनें
खाड़ी क्षेत्र में अब कई बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. संयुक्त अरब अमीरात और इराक नई पाइपलाइनें बना रहे हैं, जबकि सऊदी अरब भी अपने मौजूदा नेटवर्क का विस्तार करने की संभावनाओं पर काम कर रहा है. गोल्डमैन सैक्स की विश्लेषक एलेक्जेंड्रा पॉलस के अनुसार, यदि मौजूदा योजनाएं तय समय पर पूरी होती हैं तो 2027 के अंत तक खाड़ी देशों के युद्ध-पूर्व तेल निर्यात का करीब 45 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से बाहर के रास्तों से भेजा जा सकेगा. बैंक का अनुमान है कि 2028 के आखिर तक वैकल्पिक मार्गों से रोजाना करीब 73 लाख बैरल तेल की ढुलाई संभव होगी. इसका मतलब होगा कि खाड़ी देशों के लगभग 60 प्रतिशत तेल निर्यात को होर्मुज पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा.

UAE ने तेज की सबसे बड़ी परियोजना
संयुक्त अरब अमीरात का वेस्ट-ईस्ट पाइपलाइन प्रोजेक्ट अब लगभग आधा पूरा हो चुका है. क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद ने अधिकारियों को इसे 2027 तक पूरा करने का निर्देश दिया है. करीब 252 मील लंबी यह पाइपलाइन मौजूदा फुजैराह पाइपलाइन के समानांतर चलेगी. इसके शुरू होने के बाद UAE की जमीनी मार्ग से तेल निर्यात क्षमता बढ़कर 36 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच जाएगी. अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) के प्रमुख सुल्तान अल जाबेर ने कहा कि हाल की घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति अभी भी कुछ सीमित समुद्री रास्तों पर अत्यधिक निर्भर है. यही वजह है कि UAE ने वर्षों पहले ही होर्मुज के विकल्प तैयार करने का फैसला किया था.

इराक और सऊदी अरब भी बदल रहे हैं रणनीति
इराक ने 435 मील लंबी बसरा-हदीथा पाइपलाइन पर काम शुरू कर दिया है. आगे चलकर इसे जॉर्डन, सीरिया और तुर्किये के नेटवर्क से जोड़ा जाएगा. इस परियोजना के जरिए प्रतिदिन लगभग 25 लाख बैरल तेल की ढुलाई का लक्ष्य रखा गया है. इराकी प्रधानमंत्री मोहम्मद शिया अल-सुदानी ने इसे देश के ऊर्जा निर्यात को क्षेत्रीय अस्थिरता से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है. इस परियोजना के लिए शुरुआती चरण में करीब 1.5 अरब डॉलर का बजट रखा गया है. उधर, सऊदी अरब भी लाल सागर तक जाने वाली अपनी कच्चे तेल की पाइपलाइन की क्षमता बढ़ाकर करीब 90 लाख बैरल प्रतिदिन करने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है. हालांकि यह योजना अभी शुरुआती चरण में है.

नया बंदरगाह भी बनेगा बड़ा विकल्प
पाइपलाइन परियोजनाओं के साथ-साथ UAE अरब सागर की ओर एक नए गहरे समुद्री बंदरगाह और कंटेनर टर्मिनल की भी योजना बना रहा है. इसका उद्देश्य क्षेत्र में आने वाले माल और तेल को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजारे बिना दूसरे मार्ग से भेजना है. भविष्य में यह बंदरगाह दुबई के जेबेल अली पोर्ट के विकल्प के रूप में भी उभर सकता है.

फिर भी खत्म नहीं होगी होर्मुज की अहमियत
विशेषज्ञों का मानना है कि अरबों डॉलर के निवेश और नई परियोजनाओं के बावजूद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की रणनीतिक अहमियत पूरी तरह खत्म नहीं होगी. अनुमान है कि आने वाले वर्षों में भी रोजाना 70 से 90 लाख बैरल तेल और रिफाइंड उत्पाद इसी समुद्री रास्ते से गुजरेंगे. इसके अलावा कई वैकल्पिक मार्ग लाल सागर की सुरक्षा पर भी निर्भर हैं, जहां यमन के हूती विद्रोहियों की गतिविधियां पहले से चिंता का कारण बनी हुई हैं. ऐसे में खाड़ी देश भले ही ईरान पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हों, लेकिन फिलहाल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का विकल्प पूरी तरह तैयार होना आसान नहीं दिखता.