राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के जरिए संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत किए गए सवाल के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने को कहा कि वह राष्ट्रपति और राज्यपाल के जरिए किसी बिल को मंजूरी देने के लिए समयसीमा तय नहीं कर सकती. कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर समयसीमा पार होने पर कोर्ट मानी हुई मंजूरी घोषित करे तो यह संविधान की भावना और शक्तियों के पृथक्करण (separation of powers) के सिद्धांत के खिलाफ होगा. ‘मानी हुई मंजूरी’ का मतलब होता कि कोर्ट राज्यपाल की जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ले, जो सही नहीं है.
साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्यपाल बिल पर अनिश्चित समय तक विचार नहीं कर सकते. अगर राज्यपाल में अत्यधिक या अनावश्यक देरी होती है और इससे कानून बनाने की प्रक्रिया रुकती है, तो कोर्ट सीमित रूप से अपनी समीक्षा शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है और राज्यपाल को समयबद्ध तरीके से फैसला लेने का निर्देश दे सकता है, बिना बिल के विषय पर कोई टिप्पणी किए.
इस मामले को चीफ जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की पांच जजों की पीठ ने दस दिन सुनवाई के बाद 11 सितंबर को फैसला सुरक्षित रखा था. यह राष्ट्रपति सवाल मई में पूछा गया था, तब हाल ही में दो जजों की पीठ ने तमिलनाडु राज्यपाल मामले में बिल पर कार्रवाई के लिए समयसीमा तय की थी.