क्या आपने कभी सोचा है कि जब सीमा पर कोई पायलट हमारा लड़ाकू विमान तेजस उड़ाता है, या जब समंदर के नीचे हमारी पनडुब्बी दुश्मन को चकमा देती है, तो उसके पीछे किसका पसीना लगा होता है? वह कौन है, जो लाखों-करोड़ों लोगों की सुरक्षा के लिए टेक्नोलॉजी तैयार कर रहा है? शायद आपने नहीं सोचा होगा. चलिए हम बताते हैं. दरअसल, भारत की तीन बड़ी कंपनियों ने देश को शक्तिशाली राष्ट्र बनाने का सपना सच कर दिखाने में बड़ी भूमिका निभाई है. ये तीन कंपनियां हैं – HAL, BEL और MDSL.
ये वो नाम हैं, जो आमतौर पर चर्चा में नहीं रहते, लेकिन इनकी बनाई चीज़ों के बिना आधुनिक युग में हमारी सेना का एक भी कदम आगे नहीं बढ़ सकती. इन तीन कंपनियों के हज़ारों मज़दूरों और इंजीनियर्स के पसीने से भारत डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भर बनने का सपना देख पाया है. हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), और मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDSL) अब चर्चा में इसलिए हैं क्योंकि SIPRI ने भारत की इन्हीं तीन कंपनियों को दुनिया की टॉप 100 रक्षा कंपनियों में जगह दी है. भारत की सबसे बड़ी डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कंपनी के तौर पर HAL ने अपनी जगह बनाए रखी है. कंपनी ने 3.8 अरब डॉलर की कमाई की. ग्लोबल रैंकिंग में यह 44वें नंबर पर है.BEL की वैश्विक रैंकिंग भी 58वां स्थान हासिल किया है. MDSL ग्लोबल रैंकिंग में 91वें नंबर पर है.
SIPRI क्या है? इसका कितना महत्व है?
बता दें कि SIPRI का पूरा नाम स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट (Stockholm International Peace Research Institute) है. यह एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है जो निम्न काम करती है-
दुनिया भर में हथियारों के उत्पादन, बेचने और खरीदने से जुड़ी जानकारी इकट्ठा करती है.
विभिन्न देशों के रक्षा खर्च, हथियारों की दौड़ और सैन्य ताकत पर रिसर्च करती है.
अपनी रिपोर्टों के माध्यम से बताती है कि कौन-कौन से देश या कंपनियां रक्षा क्षेत्र में कितना काम कर रही हैं.
इसका मकसद है कि दुनिया में शांति और सुरक्षा से जुड़े मामलों पर सही और विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराना.
HAL: आसमान का सफ़र
HAL की कहानी 1940 में शुरू हुई, जब वाल्चंद हीराचंद ने बेंगलूरु में हवाई जहाज बनाने का सपना देखा. एक ऐसा सपना, जो उस दौर में बेहद साहसिक था. मैसूर के महाराजा ने ज़मीन दी और हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड की शुरुआत हुई. आज़ादी के बाद सरकार ने इसे अपने हाथ में लिया और 1964 में यह HAL बन गया.
तकनीक की कमी, विदेशी निर्भरता और ट्रेनिंग की चुनौतियों के बावजूद HAL ने आगे बढ़कर 1951 में पहला स्वदेशी ट्रेनर HT-2 बनाया. यही भारत की एविएशन आत्मनिर्भरता की नींव बना.
HAL का काम लड़ाकू जहाज़, हेलीकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट बनाना और उनका मेंटेनेंस करना है. तेजस फाइटर जेट और ध्रुव हेलीकॉप्टर जैसे प्रोजेक्ट्स ने इसे भारतीय वायुसेना की रीढ़ बना दिया है. HAL सिर्फ मशीनें नहीं बनाता, वह देश के आसमान की सुरक्षा गढ़ता है.
BEL: आंख और कान की ताक़त
BEL की शुरुआत 1954 में इसलिए हुई, क्योंकि आधुनिक युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि राडार और कम्युनिकेशन सिस्टम से जीता जाता है. BEL का मिशन था- सेना की “आंख और कान” बनना.
शुरुआती वर्षों में तकनीक और सहयोग की कमी चुनौती थी, लेकिन BEL ने R&D पर भरोसा किया. 1966 में राडार फैसिलिटी शुरू हुई और इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक वारफ़ेयर सिस्टम, सोनेर, कम्युनिकेशन नेटवर्क और फायर कंट्रोल सिस्टम जैसे अहम उपकरण बनने लगे.
BEL का मॉडल है डिजिटल वॉर क्षमता बढ़ाना, राडार जो आसमान को स्कैन करे, सिस्टम जो फोर्सेज को जोड़े, टेक्नोलॉजी जो दुश्मन को जाम कर दे. आज BEL न सिर्फ सेना बल्कि EVMs के ज़रिए लोकतंत्र को भी मज़बूत करता है. इसकी तेज़ 23.6% ग्रोथ इसकी बढ़ती क्षमता का सबूत है.
MDSL: समंदर का रक्षक
MDSL की जड़ें 1774 तक जाती हैं, जब मुंबई में एक छोटा डॉकयार्ड बना. 1960 में राष्ट्रीयकरण के बाद यह युद्धपोत निर्माण का मुख्य केंद्र बना. भारत की लंबी तटरेखा और सुरक्षा ज़रूरतों ने MDSL को बेहद महत्वपूर्ण बनाया.
टेक्नोलॉजी और सबमरीन बनाने का अनुभव कम था, लेकिन विदेशी सहयोग और आधुनिक निर्माण तकनीकों के सहारे MDSL ने धीरे-धीरे अपनी क्षमता बढ़ाई. INS नीलगिरि (1972) पहला बड़ा कदम था और INS शाल्की (1992) भारत को स्वदेशी सबमरीन बनाने वाले देशों की सूची में ले आया.
MDSL का मुख्य काम है डिस्ट्रॉयर, फ्रिगेट और सबमरीन बनाना. स्कॉर्पीन प्रोजेक्ट इसका सबसे चर्चित काम है. आज यह देश का इकलौता शिपयार्ड है जो डिस्ट्रॉयर और परंपरागत सबमरीन, दोनों बनाता है- यानी समुद्र में भारत की ढाल.