US Oil Sanctions On Iran And Russia: अमेरिका ने रूस और ईरान से जुड़े तेल पर दी जा रही अस्थायी छूट खत्म करने का फैसला लेकर वैश्विक ऊर्जा राजनीति में हलचल मचा दी है. ट्रंप प्रशासन के इस कदम को जहां ‘मैक्सिमम प्रेशर’ रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, वहीं अमेरिका के भीतर ही इसका तीखा विरोध शुरू हो गया है. डेमोक्रेटिक नेताओं का कहना है कि यह फैसला न सिर्फ वैश्विक बाजार को अस्थिर करेगा, बल्कि रूस और ईरान को लेकर अमेरिकी नीति की दिशा पर भी सवाल खड़े करता है.
जानकारी के अनुसार, अमेरिका ने साफ कर दिया है कि वह रूस और ईरान से जुड़े तेल पर दी गई प्रतिबंधों में छूट का नवीनीकरण नहीं करेगा. यह फैसला वैश्विक ऊर्जा बाजार और भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए अहम माना जा रहा है, जिन्हें इस छूट से काफी राहत मिली थी. अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि हम रूसी और ईरानी तेल के लिए दिए गए सामान्य लाइसेंस को आगे नहीं बढ़ाएंगे. यह केवल उन खेपों के लिए था जो 11 मार्च से पहले लोड हो चुकी थीं और अब उनका उपयोग हो चुका है.
क्या थी ये छूट और क्यों थी अहम?
बता दें कि ये छूट अस्थायी रूप से दी गई थी ताकि पहले से समुद्र में मौजूद तेल को वैश्विक बाजार तक पहुंचने दिया जा सके. इसका उद्देश्य युद्ध के कारण बाधित सप्लाई को संतुलित करना और ऊर्जा कीमतों को काबू में रखना था. मार्च में जब होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) में तनाव बढ़ा और ईरान ने इस अहम समुद्री मार्ग पर नियंत्रण मजबूत किया, तब अमेरिका ने 30 दिनों की छूट दी थी. इससे वैश्विक बाजार में लगभग 140 मिलियन बैरल तेल पहुंच सका.
भारत को कैसे मिला फायदा?
इस छूट का सबसे बड़ा लाभ भारत को मिला. रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारतीय रिफाइनरियों ने इस दौरान करीब 3 करोड़ बैरल रूसी तेल के ऑर्डर दिए. रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियों ने शुरुआती दबाव के बावजूद रूस की कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकोइल से तेल खरीद फिर बढ़ा दी. इतना ही नहीं, सात साल बाद पहली बार ईरानी कच्चे तेल से भरे सुपरटैंकर भी भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचे. यह संकेत था कि भारत ने अवसर का फायदा उठाते हुए अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित किया.
अब क्या होगा असर?
छूट खत्म होने से भारत को फिर से पारंपरिक सप्लायर्स मिडिल ईस्ट, अमेरिका और अन्य देशों की ओर लौटना पड़ सकता है. इससे आयात लागत बढ़ने की आशंका है. ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान और रूस से सस्ता तेल उपलब्ध नहीं रहा, तो भारत के लिए ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है. इसके अलावा, वैश्विक बाजार में भी अस्थिरता बढ़ सकती है, खासकर ऐसे समय में जब मध्य पूर्व में तनाव चरम पर है.
‘मैक्सिमम प्रेशर’ रणनीति पर काम कर रहा अमेरिका
अमेरिका का यह कदम साफ संकेत देता है कि वह ईरान पर ‘मैक्सिमम प्रेशर’ की नीति को फिर से सख्ती से लागू कर रहा है. इस नीति के तहत वाशिंगटन तेहरान की तेल आय को सीमित कर उसके परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों पर दबाव बनाना चाहता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि पूरी तरह रणनीतिक और राजनीतिक भी है. इस नीति को लेकर अमेरिका के भीतर भी मतभेद सामने आए हैं. डेमोक्रेटिक नेता रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि रूस को दी गई छूट ने उसे आर्थिक लाभ पहुंचाया और उसके युद्ध प्रयासों को मजबूत किया. इसी तरह चक शूमर समेत कई नेताओं ने ट्रंप प्रशासन की इस नीति को खतरनाक बताया और इसे वापस लेने की मांग की. उनका तर्क है कि ऐसी छूट रूस और ईरान जैसे देशों को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत करती है, जिससे वैश्विक सुरक्षा पर असर पड़ सकता है.
भारत के सामने अब चुनौती यह है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को संतुलित तरीके से पूरा करे. एक ओर उसे सस्ती आपूर्ति की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय दबाव और प्रतिबंधों का भी ध्यान रखना होगा. भारत पहले भी 2019 में अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद ईरानी तेल आयात बंद कर चुका है और उसने वैकल्पिक स्रोतों की ओर रुख किया था. मौजूदा स्थिति में, नई दिल्ली को फिर से अपनी ऊर्जा रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है जिसमें विविध सप्लायर्स, रणनीतिक भंडारण और दीर्घकालिक समझौते शामिल हो सकते हैं.