जयपुर: राजस्थान के रेगिस्तानी धोरों और उपजाऊ खेतों से अब सिर्फ अनाज ही नहीं, बल्कि ‘कार्बन’ भी पैदा होगा, जो किसानों की जेबें भरेगा। प्रदेश की भजनलाल सरकार ने किसानों की आय बढ़ाने के लिए एक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए एग्रीकल्चरल लैंड मैनेजमेंट आधारित कार्बन प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी है। कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा की पहल पर राजस्थान अब कार्बन क्रेडिट के जरिए किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने वाला देश का अग्रणी राज्य बन गया है।
क्या है यह जादुई प्रोजेक्ट?
सरल शब्दों में कहें तो किसान अपने खेत में जितनी हरियाली बढ़ाएगा और मिट्टी को स्वस्थ रखेगा, उतना ही कार्बन सोखा जाएगा। इस सोखे गए कार्बन को ‘कार्बन क्रेडिट’ में बदला जाएगा, जिसे अंतरराष्ट्रीय कंपनियां खरीदेंगी। इसके बदले किसानों के बैंक खातों में सीधी ‘कार्बन इनकम’ आएगी। कृषि विभाग और मैसर्स IORA ईकोलोजिकल सोल्यूशन के बीच इसके लिए एमओयू हो चुका है।
एक हेक्टेयर से 24,000 रुपये तक की अतिरिक्त कमाई
यह कोई काल्पनिक आंकड़ा नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, उन्नत कृषि पद्धतियों को अपनाकर एक किसान प्रति हेक्टेयर सालाना 0.5 से 10 टन कार्बन उत्सर्जन कम कर सकता है। कार्बन क्रेडिट के मौजूदा वैश्विक बाजार भाव को देखें तो किसानों को प्रति हेक्टेयर ₹7,750 से लेकर ₹24,350 तक की सालाना अतिरिक्त आय हो सकती है। यह कमाई उनकी मुख्य फसल की आय से अलग होगी।
किसान को क्या करना होगा?
इस प्रोजेक्ट का लाभ उठाने के लिए किसानों को अपनी खेती के पुराने ढर्रे में कुछ बदलाव करने होंगे
अवशेष प्रबंधन: फसल के अवशेषों (पराली आदि) को जलाने के बजाय उन्हें जमीन में ही दबाना।
स्मार्ट सिंचाई: ड्रिप और स्प्रिंकलर (फव्वारा) सिंचाई का उपयोग करना।
मिट्टी का पोषण: रासायनिक खादों के बजाय जैविक खाद, कम्पोस्ट और इंटरक्रॉपिंग (मिश्रित खेती) को बढ़ावा देना।
कृषि वानिकी: खेत की मेड़ों पर पेड़ लगाना और कम जुताई वाली खेती करना।
जलवायु परिवर्तन से जंग, मिट्टी को नया जीवन
इस पहल से न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी, बल्कि मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा बढ़ेगी, जिससे भूमि अधिक उपजाऊ होगी। सोलर पंप और फार्म पॉन्ड का उपयोग करने वाले किसानों के लिए यह ‘सोने पर सुहागा’ साबित होगा। राजस्थान का यह मॉडल न केवल पर्यावरण बचाएगा, बल्कि खेती को एक मुनाफे वाले बिजनेस में बदल देगा।