राजस्थान में निकाय-पंचायत चुनाव पर ‘मानसून’ का साया? सितंबर-अक्टूबर तक टल सकती हैं सरगर्मी

जयपुर: राजस्थान में पंचायती राज और शहरी स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर सस्पेंस लगातार गहराता जा रहा है। अगर आप सोच रहे थे कि जुलाई के अंत तक गांवों और शहरों में चुनावी बिगुल बज जाएगा, तो फिलहाल अपनी उम्मीदों पर थोड़ा ब्रेक लगा लीजिए। राज्य में सीटों के आरक्षण की धीमी रफ्तार और ऊपर से मानसून की दस्तक ने मिलकर चुनावी शेड्यूल का पूरा गणित बिगाड़ दिया है। अब इस बात के पुख्ता संकेत मिल रहे हैं कि ये चुनाव जुलाई के बजाय सितंबर या अक्टूबर तक खिसक सकते हैं।

हाई कोर्ट की ‘डेडलाइन’ बनाम जमीनी हकीकत
दरअसल, राजस्थान हाई कोर्ट ने बीते 22 मई को एक सख्त आदेश जारी करते हुए राज्य निर्वाचन आयोग और सरकार को निर्देश दिया था कि पंचायती राज और स्थानीय निकायों के आम चुनाव की पूरी प्रक्रिया हर हाल में 31 जुलाई तक मुकम्मल कर ली जाए।

हाई कोर्ट के इसी डंडे के बाद राज्य निर्वाचन आयोग सक्रिय हुआ और उसने पंचायती राज विभाग तथा स्वायत्त शासन विभाग को चिट्ठी लिखकर आरक्षण की प्रक्रिया को तुरंत अंतिम रूप देने को कहा। नियम के मुताबिक, एससी, एसटी, ओबीसी और महिलाओं के लिए वार्डवार सीटों का निर्धारण राज्य सरकार को ही करना है। हालांकि, ग्राम पंचायतों से लेकर नगर निगमों तक वार्डों का पुनर्गठन तो पूरा हो चुका है, लेकिन आरक्षण की फाइनल अधिसूचना अभी भी सरकारी फाइलों में अटकी हुई है।

और अब आड़े आ गया ‘मानसून’
चुनावों के लेट होने की सबसे बड़ी और व्यावहारिक वजह बनकर उभरा है राजस्थान का मानसून। अधिकारियों का मानना है कि जुलाई के महीने में प्रदेश के कई हिस्सों में भारी बारिश की चेतावनी है। ऐसे में ग्रामीण इलाकों में संपर्क टूटने, बाढ़ जैसे हालात बनने और पोलिंग पार्टियों को सुदूर क्षेत्रों में भेजने में भारी लॉजिस्टिक दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। बारिश के मौसम में मतदान प्रतिशत भी बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि मानसून के गुजर जाने के बाद यानी सितंबर या अक्टूबर को चुनाव कराने के लिए सबसे मुफीद समय माना जा रहा है।

निर्वाचन आयोग तैयार, सरकार के ग्रीन सिग्नल का इंतजार
राज्य निर्वाचन आयोग का साफ कहना है कि वह चुनाव कराने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है और मतदाता सूचियों से लेकर अन्य तैयारियां अंतिम चरण में हैं। लेकिन जब तक राज्य सरकार की ओर से विभिन्न श्रेणियों के लिए आरक्षण का फाइनल प्रपोजल नहीं आ जाता, तब तक चुनाव की तारीखों का आधिकारिक ऐलान मुमकिन नहीं है। अब गेंद पूरी तरह सरकार के पाले में है कि वह हाई कोर्ट की डेडलाइन का पालन करने के लिए कोई बीच का रास्ता निकालती है या फिर मानसून का हवाला देकर अदालत से और वक्त मांगती है।