अब ट्रेन से चोरी नहीं होंगे चादर और तौल‍िये, रेलवे ला रहा हाईटेक स‍िस्‍टम; बैग में रखकर चले तो बजेगा हूटर

अगर आप भी ट्रेन के एसी कोच से सफर करते हैं तो यह खबर आपके काम की है. जी हां, अब ट्रेन के एसी कोच से तौलिया, कंबल, चादर और तकिया कवर चोरी होने के दिन अब लदने वाले हैं. रेलवे बोर्ड अपने बेडरोल (लिनन) मैनेजमेंट को पूरी तरह हाईटेक बनाने की तैयारी कर रहा है. अब बेडरोल से जुड़े सामान में बेहद बारीक RFID (रेडियो फ्रीक्‍वेंसी आइडेंटिफिकेशन) चिप लगाई जाएगी. रेलवे की इस तकनीक से ‘एक तीर से दो निशाने’ साधे जाएंगे. इससे हर साल होने वाली लाखों रुपये की चोरी तो रुकेगी ही, साथ ही सख्त डिजिटल मॉनिटरिंग के चलते यात्रियों को गंदे और बदबूदार कंबलों से भी छुटकारा म‍िलेगा.

कंबल और चादर में आरएफआईडी (RFID) चिप लगाने के साथ ही ट्रेन के एग्जिट गेट्स (निकास द्वार) पर द‍िखाई नहीं देने वाले सेंसर भी फिट क‍िये जाएंगे. यद‍ि कोई यात्री रेलवे के इन कपड़ों को अपने बैग में छिपाकर ले जाने की कोशिश करेगा तो ट्रेन से उतरते ही दरवाजे पर लगा सेंसर एक्टिव हो जाएगा और तुरंत तेज अलार्म (हूटर) बजाकर चोर को पकड़ लेगा. रेलवे बोर्ड के एक अध‍िकारी ने बताया क‍ि मुंबई के सेंट्रल और वेस्टर्न डिवीजन ने राजधानी और अगस्त क्रांति एक्सप्रेस जैसी प्रीमियम ट्रेनों के बेडरोल मैनेजमेंट के लिए इसका ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया है. रेलवे बोर्ड ने योजना का दायरा और बढ़ाने का फैसला किया है.

अध‍िकारी की तरफ से बताया गया क‍ि भारतीय रेलवे सालाना करीब 14 से 15 करोड़ बेडरोल की सप्‍लाई करता है. इसमें से करीब 10 से 12 लाख आइटम चोरी हो जाते हैं. इनमें तौलिये और चादरों की संख्या ज्‍यादा होती है. रेलवे के इंटरनल एसेसमेंट के अनुसार, लंबी दूरी की प्रीमियम ट्रेनों के अंतिम गंतव्य या टर्मिनल स्टेशनों पर पहुंचने के दौरान चोरी की घटनाएं ज्यादा देखने को म‍िलती हैं. उन्‍होंने बताया क‍ि इस तकनीक को शुरू करने का खर्च भी ज्‍यादा नहीं है.

च‍िप लगाने की क‍ितनी आएगी लागत?
ह‍िन्‍दुस्‍तार अखबार में प्रकाश‍ित खबर के अनुसार एक बेडरोल में चिप लगाने का खर्च महज 20 से 50 रुपये आएगा. एक कोच या स्टेशन पर स्कैनर सिस्टम लगाने में 20 से 30 हजार रुपये का खर्च होगा. यह लागत चोरी से होने वाले सालाना नुकसान के मुकाबले बहुत कम है. आंकड़ों की मानें तो बेडरोल चोरी होने से रेलवे को हर साल 50 से 60 करोड़ रुपये का नुकसान होता है. प्राइवेट वेंडर्स वाली ट्रेनों में चोरी के सामान की भरपाई अटेंडेंट्स की सैलरी से की जाती है.