हमें पसंद हो, न हो पर हिजाब पहनने के अधिकार छीन नहीं सकते, सुप्रीम कोर्ट में दी गई दलील

Whether we like it or not, we cannot take away the right to wear hijab, the argument given in the Supreme Court
Whether we like it or not, we cannot take away the right to wear hijab, the argument given in the Supreme Court
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नई दिल्ली : हिजाब बैन के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में याची के वकील ने कहा कि हमें पसंद हो या ना हो, हिजाब पहनने का अधिकार नहीं छीन सकते। याची के वकील दुष्यंत दवे ने दलील दी कि हमें पसंद हो या न हो लेकिन इससे किसी को हिजाब पहनने के अधिकार को नहीं छीना जा सकता है। दुष्यंत दवे ने दलील दी कि यह मामला सिर्फ यूनिफर्म का नहीं है। हम किसी मिलिट्री स्कूल की बात नहीं कर रहे हैं और न ही यह मामला मिलिट्री स्कूल से जुड़ा है और न ही हम किसी नाजी स्कूल को डील कर रहे हैं जो रेजिमेंट बनाता है। हम प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज की बात कर रहे हैं। भारत एक बेहतरीन कल्चर का देश है जिसने सबको आत्मसात किया।

5000 साल पुरानी विरासत हमें मिली हुई है
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हेमंत गुप्ता की अगुवाई वाली बेंच में सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने दलील दी कि भारत देश एक बेहतरीन सांस्कृतिक देश है यह एक बेहतरीन कल्चर से बना हुआ है। यहां की विरासत महान है। 5000 साल पुरानी विरासत हमें मिली हुई है। हमने कई धर्म अपनाए। इतिहासकार बताते हैं कि भारत में जहां से लोग आए वह सब यहां होकर रह गए और भारत ने उन्हें अपना लिया। भारत में हिंदुत्व, जैन, बुद्ध सब का जन्म हुआ। यहां इस्लाम आया और उसे भी स्वीकार किया गया। भारत ने तो सबको स्वीकारा है और ब्रिटिश को भी स्वीकारा।

सविधान लिबर्टी की बात करता है
दवे ने दलील दी कि यह एक उदारवादी देश है। भारत में विविधता में एकता है। हम सब औरंगजेब के कृत्यों की निंदा की है लेकिन हमने देखा है कि अकबर के कार्यकाल में देश का विकास हुआ है। दवे ने भारत के संविधान का जिक्र किया और उसे बनाने के दौरान संविधान सभा की बहस पर भी ध्यान दिलाया और कहा कि किस तरह से प्रबुद्ध लोगों ने उस दौरान बहस की जो पढ़ने योग्य है। संविधान हमेशा लिबर्टी यानी स्वच्छंदता की बात करता है। अनुच्छेद-21 में जीवन और स्वतंत्रता की बात है वहीं अनुच्छेद-19 अभिव्यक्ति की बात करता है।

लव जेहाद जैसे कानून बने हैं
दवे ने कहा कि अब देश में लव जिहाद जैसे कानून बन रहे हैं। विविधता में एकता कैसे होगा। अगर किसी हिंदू को मुस्लिम से शादी करने के लिए मैजिस्ट्रेट से इजाजत लेनी पड़े तो कैसी एकता है? जबकि देश में दो बीजेपी नेता हैं जिनकी शादी हिंदू से हो रखी है। अकबर की शादी भी राजपूत से हुई थी और भगवान की पूजा की उन्होंने अनुमति दी दी थी। संविधान में सिर्फ कृपाण की बात है लेकिन पगड़ी सब पहनते हैं। हिजाब पहनने से कैसे किसी की भावनाएं आहत हो सकती है जबकि यह एक विशेष समुदाय की पहान है।

लेकिन पटेल खुद बहुत ज्यादा सेक्युलर थे
दवे ने यह भी दलील दी कि आजकल सरदार पटेल की बात हो रही है। जबकि पटेल बेहद सेक्युलर व्यक्ति थे। उन्होंने संविधान सभा की बहस में कहा था कि अगर बहुसंख्यक के साथ अल्पसंख्यक बेहद भरोसे के साथ रहें तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता है। कोर्ट का एक ही धर्म है वह है संविधान। हिंदू के लिए गीता और मुस्लिम के लिए कुरान हो सकता है लेकिन संविधान के बिना हम कहीं नहीं हैं। उन्होंने आंबेडकर को कोट करते हुए कहा कि अल्पसंख्यक एक एक्सप्लोसिव फोर्स है और वह फट पड़ा तो सामाजिक तानाबाना नष्ट हो जाएगा। दवे ने इसे चेतावनी के तौर पर याद करने को कहा और कहा कि इस्लामिक देशों को देखिये 10 हजार से ज्यादा आत्मघाती हमले हुए हैं लेकिन भारत में ऐसा नहीं होता है। वहीं, सीरिया और इराक में रोजाना होते हैं। यानी की भारत में उनकी आस्था है।

क्रिश्चियन स्कूल में कभी कन्वर्ट करने की कोशिश नहीं हुई
दुष्यंत दवे ने संविधान सभा में कृष्णमाचारी के डिबेट को रेफर करते हुए कहा कि उन्होने कहा था कि वह क्रिश्चियन स्कूल में पढ़े लेकिन कभी उन्हें कन्वर्ट करने की कोशिश नहीं हुई। हमारे बच्चे पढ़े लेकिन कभी उन्हें नहीं कहा गया कि बाइबल अपने साथ ले जाओ। हम ऐसे लिबरल सोच को खो रहे हैं। अगर कोई प्यार करता है और शादी करता है तो कहा जाता है कि कन्वर्ट करने के लिए कोशिश है। कोई तिलक तो कोई क्रॉस पहनता है यह सामाजिक खूबसूरती है

सदियों से महिलाएं हिजाब पहन रही हैं
दवे ने कहा कि सदियों से महिलाएं हिजाब पहन रही है। मलेशिया, अमेरिका जैसे आधुनिक देश में महिलाएं हिजाब पहन रही हैं. जैसे सिख अगर पगड़ी पहनता है और वह उसके लिए अहम है तो फिर महिलाओं के लिए हिजाब भी अहम है और इसमें गलत क्या है। यह आस्था का विषय है कि कोई तिलक लगाता है तो कोई क्रॉस पहनता है यह सबका अपना अधिकार है और यही सामाजिक खूबसूरती है। क्या हिजाब पहनने से देश की एकता और अखंडता को खतरा है।

अनुच्छेद 13 के तहत देखा जाए सर्कुलर
दुष्यंत दवे ने यह भी दलील दी कि कर्नाटक सरकार ने जो हिजाब बैन के लिए सर्कुलर जारी कर कानून बना दिया है उसका संविधान के अनुच्छेद-13 के तहत परीक्षण होना चाहिए। क्योंकि यह सर्कुलर संविधान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। गौरतलब है कि अनुच्छेद-13 के तहत व्यवस्था है कि देश का कोई भी कानून संविधान के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करे तो वह गैर संवैधानिक होगा। दवे ने कहा कि जो भी समुदाय का विश्वास है और व्यक्ति जो आस्था रखता है वह धार्मिक का पालन करता है। हाई कोर्ट ने जजमेंट में कहा है कि धर्म का पालन धार्मिक जगह पर होगा यह तो बैन जैसा है।

HC नहीं समझ पाया नैतिकता और संवैधानिक दर्शन
हाई कोर्ट संवैधानिक नैतिकता और संवैधानिक दर्शन क्या है यह नहीं समझ पाया है। मौलिक अधिकार चाहे बेडरूम हो या क्लास रूम हर जगह अक्षुण्ण है। जस्टिस गुप्ता ने कहा कि आदरणीय जगह पर सिर ढकने की परंपरा है। इसपर दवे ने कहा कि क्लास रूम भी आदरणीय जगह है। पीएम को देखिये हर महत्वपूर्ण अवसर पर वह लोगों के सम्मान में सिर पर पगड़ी पहनते हैं। धार्मिक अधिकार को दवे ने अपना व्यक्तिगत पसंद बताया है। उन्होंने कहा कि यह मेरी पसंद है कि मैं मौलवी या पंडित का अनुसरण करूं या न करूं। अगर मुस्लिम महिलाएं सोचती हैं और समझती हैं कि हिजाब उनके धर्म का हिस्सा है तो उसमें दखल नहीं हो सकता है। कोई बाहर की अथॉरिटी कैसे कह सकती है कि यह चीज धर्म की जरूरी प्रैक्टिस है या नहीं? हमें कुछ पसंद हो या न हो लेकिन इससे हम किसी को हिजाब पहनने के अधिकार तो नहीं छिन सकते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आगे की सुनवाई मंगलवार को होगी।